देश की सियासत में मुस्लिम वोट बैंक को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। हाल के चुनावी नतीजों और जमीनी फीडबैक से संकेत मिले हैं कि मुस्लिम मतदाता अब परंपरागत ढर्रे से हटकर रणनीतिक वोटिंग की ओर बढ़ रहे हैं। खासतौर पर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के उभार के बाद कांग्रेस और अन्य दलों के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। ओवैसी जहां खुद को मुसलमानों की मजबूत आवाज के रूप में पेश कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस को डर है कि इससे सेकुलर वोटों का बंटवारा हो सकता है।

इसी खतरे को देखते हुए कांग्रेस ने नया दांव चला है। पार्टी मुस्लिम बहुल सीटों पर स्थानीय प्रभाव वाले नेताओं को आगे बढ़ा रही है और अल्पसंख्यक संगठनों से सीधा संवाद कायम कर रही है। कई राज्यों में कांग्रेस ने मुस्लिम चेहरों को संगठन में अहम जिम्मेदारियां दी हैं। इसके अलावा पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि ओवैसी की राजनीति भाजपा को अप्रत्यक्ष फायदा पहुंचाती है, इसलिए “रणनीतिक एकजुटता” जरूरी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम समाज अब सिर्फ भावनात्मक मुद्दों पर वोट नहीं दे रहा, बल्कि शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और हिस्सेदारी जैसे सवालों पर फैसले ले रहा है। कई जगहों पर युवा मतदाता ओवैसी की आक्रामक शैली से प्रभावित दिखते हैं, जबकि एक बड़ा वर्ग अभी भी कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले मजबूत विकल्प मानता है। यही वजह है कि वोटों के बिखराव को रोकना कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस की यह रणनीति कितनी कारगर साबित होती है। यदि मुस्लिम वोटों का बंटवारा बढ़ा तो विपक्षी एकता को बड़ा झटका लग सकता है। वहीं, ओवैसी की पार्टी भी लगातार नए राज्यों में पैर पसार रही है। कुल मिलाकर मुस्लिम वोटिंग पैटर्न का यह बदलाव राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाने वाला है।