MDU की शोधार्थी का कमाल: नैनोसस्पेंशन से दमा-सीओपीडी का कारगर इलाज, कम डोज में ज्यादा असर

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MDU researcher invents effective technique for asthma and COPD disease

महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी (एमडीयू) की शोधार्थी निशा गुलाटी ने दमा (अस्थमा) और क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) के इलाज में कारगर नैनोपार्टिकुलेट ड्रग डिलीवरी सिस्टम तैयार किया है। नैनोसस्पेंशन तकनीक के इस्तेमाल से दवा सीधे फेफड़ों तक पहुंचती है। इससे दवा की प्रभावशीलता बढ़ जाती है। यह तकनीक दवा के साइड इफेक्ट्स भी कम करती है।

प्रो. हरीश दुरेजा के मार्गदर्शन में शोध कर रहीं पीएचडी शोधार्थी निशा गुलाटी ने बताया कि दमा और सीओपीडी ऐसी बीमारी है जिसमें फेफड़ों की नलियां संकुचित हो जाती हैं। इससे मरीज को सांस लेने में परेशानी होती है। धूल, धुआं, एलर्जी और मौसम के बदलाव से यह समस्या और बढ़ जाती है। श्वांस नलियां सिकुड़ने से दवा का असर कम हो जाता है और मरीज की हालत भी बिगड़ जाती है।

इसी को ध्यान में रखकर उन्होंने रोफ्लूमिलास्ट दवा का नैनोसस्पेंशन तैयार किया। फिर इसे हाई शियर होमोजेनाइजेशन और अल्ट्रासोनिक तकनीक के जरिए विकसित किया। बताया कि नैनोसस्पेंशन तकनीक से सीधे दवा फेफड़ों तक पहुंचने में कारगर है। इससे मरीज को जल्द लाभ मिलता है।

साल 2022-24 में एनसीआर में मिले दो लाख से अधिक श्वास रोगी
संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक, साल 2022-24 के बीच दिल्ली-एनसीआर में दो लाख से अधिक श्वास रोगी अस्पताल पहुंचे थे। द लैंसेट रेस्पिरेटरी मेडिसिन (2026) में प्रकाशित एक अध्ययन में पता चला है कि एशिया में करीब 43 फीसदी लोग श्वसन रोगों से पीड़ित हैं।

जानें…सांस के रोगी के लक्षण
लगातार खांसी आना श्वास रोग का सामान्य लक्षण है। इसके अलावा सूखी खांसी, बलगम वाली खांसी, सांस फूलना, सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज आना, सीने में जकड़न या दर्द होना भी शामिल है। इन बीमारियों के कारण सामान्य गतिविधियां जैसे चलना, सीढ़ियां चढ़ना या यहां तक कि बात करना भी मरीज के लिए थकाने वाला हो जाता है।

हम अब नैनोपार्टिकुलेट ड्रग डिलीवरी सिस्टम पर आधारित नई नैनोसस्पेंशन दवा विकसित कर रहे हैं, जो सीओपीडी और अस्थमा के मरीजों के लिए अधिक प्रभावी साबित होगी। इस तकनीक से दवा सीधे फेफड़ों तक पहुंचेगी, जिससे कम डोज में बेहतर असर मिलेगा और साइड इफेक्ट्स भी काफी कम होंगे। -प्रो. हरीश दुरेजा, डीन रिसर्च और विकास, एमडीयू रोहतक।

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Author: priya singh