गेहूं खरीद शुरू होने से पहले ही भंडारण की गंभीर समस्या, आढ़तियों की हड़ताल का एलान और मौसम की मार ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। मंडियों में गेहूं की आमद भी इस बार देरी से होने की आशंका जताई जा रही है जिससे पूरे सिस्टम पर दबाव बढ़ सकता है।

सरकार ने गेहूं खरीद को लेकर बड़ी तैयारियों का दावा किया है परंतु जमीनी स्तर पर व्यवस्थाएं सवालों में हैं। 1 अप्रैल से शुरू हो रहे सीजन से पहले ही सिस्टम की कमजोरियां सामने आने लगी हैं। इससे खरीद प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका है।
राज्यभर में 1897 मंडियों को तैयार किया गया है और करीब 700 अस्थायी मंडियां भी स्थापित की जा रही हैं। इस बार सरकार ने 132 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य रखा है, जो पिछले साल से अधिक है।
राज्य सरकार ने केंद्र से मांग की है कि 122 लाख मीट्रिक टन गेहूं का उठान सीधे मंडियों से किया जाए ताकि भंडारण पर दबाव कम हो सके। इसके लिए सीजन के दौरान 810 ट्रेनें चलाने का प्रस्ताव भी रखा गया है।
100 लाख मीट्रिक टन भंडारण की व्यवस्था तैयार
खाद्य आपूर्ति विभाग का दावा है कि करीब 100 लाख मीट्रिक टन भंडारण की व्यवस्था तैयार है। इसमें 50 लाख मीट्रिक टन क्षमता के कवर प्लिंथ, 11 लाख मीट्रिक टन के नए भंडारण स्थल, 2 लाख मीट्रिक टन के पुराने साइलो और 4 लाख मीट्रिक टन के नए साइलो शामिल हैं। इसके अलावा 31 लाख मीट्रिक टन गेहूं ओपन यार्ड और मिलरों के पास रखने की योजना है।
केंद्र सरकार ने खरीद के लिए 30,973 करोड़ रुपये की क्रेडिट कैश लिमिट जारी कर दी है लेकिन बारदाने की कमी भी चिंता का विषय बन रही है। जूट उत्पादन में कमी और अंतरराष्ट्रीय हालात के कारण इस बार केवल 4 लाख जूट बोरे ही उपलब्ध हो पाए हैं। साथ ही 80 हजार प्लास्टिक बैग की व्यवस्था की गई है, लेकिन इनमें से भी 50 हजार बैग की आपूर्ति बाधित हुई है।
आढ़तियों की हड़ताल से बढ़ी मुश्किल
गेहूं खरीद शुरू होने से पहले ही आढ़तियों ने 1 अप्रैल से हड़ताल पर जाने का एलान कर दिया है जिससे पूरी खरीद प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका है। आढ़तियों की मुख्य मांग कमीशन बढ़ाने की है।
फेडरेशन ऑफ आढ़ती एसोसिएशन पंजाब के उपाध्यक्ष अमनदीप सिंह का कहना है कि उन्हें पहले 2.50 प्रतिशत कमीशन मिलता था जिसे बहाल किया जाना चाहिए। वर्तमान में प्रति क्विंटल 46 रुपये से बढ़ाकर 50 रुपये किया गया है, जबकि उनकी मांग 65 रुपये प्रति क्विंटल की है।
एसोसिएशन के प्रधान विजय कालरा ने साफ कहा है कि जब तक मांगें पूरी नहीं होंगी, काम ठप रखा जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि निजी साइलो में जाने वाले गेहूं पर भी मंडियों के बराबर कमीशन मिलना चाहिए।
राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि आढ़तियों की मांग केंद्र सरकार के सामने रखी जा चुकी है, लेकिन यदि समय रहते समाधान नहीं हुआ तो खरीद सीजन पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
मौसम और देरी से आमद का असर
पिछले कुछ दिनों में हुई बारिश ने भी गेहूं खरीद को प्रभावित करने के संकेत दिए हैं। फसल में नमी बढ़ने के कारण मंडियों में गेहूं की आमद देरी से होने की संभावना है।
मोगा और जालंधर जैसे जिलों में अनुमान है कि 10 से 15 अप्रैल के बाद ही आमद तेज होगी। वहीं लुधियाना में विशेषज्ञों का मानना है कि वैसाखी के आसपास ही मंडियों में गेहूं पहुंचना शुरू होगा।
केंद्र तो बनाए लेकिन पानी-शौचालय तक की व्यवस्था नहीं
पठानकोट की मंडियों की स्थिति सबसे चिंताजनक बताई जा रही है। यहां दाना मंडी सहित कई मंडियों में मूलभूत सुविधाओं की कमी है। पीने का पानी, शौचालय और पक्के फर्श जैसी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं, जिससे किसानों को परेशानी हो सकती है।
अमृतसर में भी कई मंडियों में तैयारियां अधूरी हैं। हालांकि प्रशासन ने 57 खरीद केंद्र स्थापित करने का दावा किया है और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात कही है लेकिन किसान संगठनों ने चेतावनी दी है कि समय पर व्यवस्थाएं पूरी नहीं हुईं तो किसानों को दिक्कत होगी। दूसरी ओर मोगा जिले में प्रशासन ने 121 मंडियों में सफाई और अन्य व्यवस्थाओं के लिए टेंडर पास कर दिए हैं। लुधियाना की खन्ना मंडी में भी पर्याप्त बारदाने और स्टोरेज की व्यवस्था होने का दावा किया गया है।
जालंधर में मंडी बोर्ड ने सभी तैयारियां पूरी होने का दावा किया है और किसानों के लिए ऑनलाइन पंजीकरण सुविधा भी शुरू की जा रही है।
सरकार का दावा, लेकिन चुनौतियां बरकरार
खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री लालचंद कटारूचक्क ने कहा है कि गेहूं खरीद के लिए सभी इंतजाम पूरे हैं और एमएसपी पर खरीद सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने यह भी माना कि यदि उठान में देरी हुई तो समस्याएं खड़ी हो सकती हैं इसलिए केंद्र को इस संबंध में पत्र लिखा गया है।
कुल मिलाकर पंजाब में गेहूं खरीद सीजन इस बार तैयारियों और चुनौतियों के बीच शुरू हो रहा है। एक तरफ सरकार बड़े दावों के साथ मैदान में है तो दूसरी तरफ भंडारण संकट, आढ़तियों की हड़ताल, मौसम की मार और बारदाने की कमी जैसे मुद्दे पूरे सिस्टम की परीक्षा लेने को तैयार हैं।
यदि इन चुनौतियों का समय रहते समाधान नहीं हुआ तो किसानों को अपनी फसल बेचने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है और राज्य की कृषि व्यवस्था पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है।
