विधवा को 28 साल बाद इंसाफ: हाईकोर्ट ने माना मुआवजे का हकदार, पिता का ट्रैक्टर चला रहे युवक की हुई थी माैत

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27 साल के जसबीर सिंह की अगस्त 1996 में उस समय मौत हो गई थी, जब वह अपने नियोक्ता के निर्देश पर प्लांटर की मरम्मत कर लौट रहा था। जसबीर की मौत के बाद उसकी पत्नी कश्मीर कौर और उसका बेटा बिना किसी आर्थिक सहारे के रह गए थे।

Justice for widow after 28 years High Court rules entitled to compensation

करीब 28 साल बाद न्याय करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने ट्रैक्टर हादसे में मृत व्यक्ति की विधवा को मुआवजा का हकदार मानते हुए उसे यह राशि जारी करने का आदेश दिया है। वर्ष 1998 में कर्मचारी मुआवजा आयुक्त ने दावे को खारिज कर दिया था और इस आदेश को चुनौती दी गई थी।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल पिता-पुत्र का रिश्ता होने से वैध नियोक्ता-कर्मचारी संबंध से इन्कार नहीं किया जा सकता। जस्टिस पंकज जैन ने आदेश में कश्मीर कौर को कुल 4,27,140 रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही दुर्घटना के 30 दिन बाद से 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज तथा 35 प्रतिशत दंड (जिस पर 7 प्रतिशत ब्याज देय होगा) भी देने का आदेश दिया है।

27 साल के जसबीर सिंह की अगस्त 1996 में उस समय मौत हो गई थी, जब वह अपने नियोक्ता के निर्देश पर प्लांटर की मरम्मत कर लौट रहा था। जसबीर की मौत के बाद उसकी पत्नी कश्मीर कौर और उसका बेटा बिना किसी आर्थिक सहारे के रह गए थे। जसबीर सिंह 2,300 रुपये प्रतिमाह पर ट्रैक्टर चालक के रूप में काम कर रहा था। ट्रैक्टर उसके पिता सिमर चंद का था, जो एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी थे।

परिवार जुलाई 1993 से अलग-अलग रह रहा था। सिमर चंद ने लिखित रूप में स्वीकार किया था कि उनका बेटा उनके यहां चालक के रूप में कार्यरत था और उन्होंने मुआवजा दावे का समर्थन किया था। बीमा कंपनी ने मुआवजा दावे का विरोध करते हुए इसे आपसी मिलीभगत बताया था और तर्क दिया कि पिता व पुत्र के बीच वास्तविक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध हो ही नहीं सकता।

मई 1998 में होशियारपुर के कर्मचारी मुआवजा आयुक्त ने दावा खारिज करते हुए कहा था कि ट्रैक्टर परिवार का था और मृतक कर्मचारी नहीं था। कश्मीर कौर ने 1998 में ही हाईकोर्ट में अपील दायर की थी, जो लगभग 28 वर्षों तक लंबित रही।

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Author: NIMRA SALEEM

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