मान्यता है कि गुरु पूर्णिमा के ही दिन महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था। सनातन धर्म में महर्षि वेदव्यास को प्रथम गुरु का दर्जा प्राप्त है। क्योंकि सबसे पहले मनुष्य जाति को वेदों की शिक्षा उन्होंने ही दी थी। इसके अलावा महर्षि वेदव्यास को आदि गुरु का दर्जा प्राप्त है। गुरु पूर्णिमा के दिन विशेष तौर पर महर्षि वेदव्यास की पूजा होती है।
सोमवार को यह बिचार गुरूपूणिमा के पावन मौके पर गुरू पूजा के मौके पर आचार्य खगेन्द्र शास्त्री ने प्रकट किए उन्होंने कहा कि गुरु कोई शरीर नहीं, एक तत्व है जो पूरे ब्रह्मांड में विद्यमान है। मेरा गुरु या तेरा गुरु शरीर के स्तर पर अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन गुरु तत्त्व तो एक ही है। गुरु और शिष्य का संबंध शरीर से परे आत्मिक होता है। गुरु पूर्णिमा गुरु से दीक्षा लेने, साधना को मजबूत करने और अपने भीतर गुरु को अनुभव करने का दिन है। गुरु को याद करने से हमारे विकार वैसे ही दूर होते हैं जैसे प्रकाश के होने पर अंधेरा दूर हो जाता है। चित्त में पड़े अंधकार को मिटाने वाला कोई और नहीं, बल्कि गुरु ही होते हैं। गुरु ही हैं जो जीना सिखाते हैं और मुक्ति की राह दिखाते हैं। कहते हैं ‘हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर,’ अर्थात हरि के रूठने पर तो गुरु की शरण मिल जाती है, लेकिन गुरु के रूठने पर कहीं भी शरण नहीं मिल पाती। सामान्य मनुष्य से लेकर अवतार तक गुरु की आवश्यकता सबको होती है। गुरु पूर्णिमा, गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा, गुरु पूजा और कृतज्ञता का दिन है, इसी दिन महाभारत के रचयिता वेद व्यास जी का जन्मदिन भी है। उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
Author: Sunil Kumar
SASNI, HATHRAS