पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पंचकूला नगर निगम चुनाव प्रक्रिया में सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने 4 सितंबर 2025 को जारी उस अधिसूचना को असांविधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया, जिसके तहत अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 4 से घटाकर 3 कर दी गई थी।
जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि आरक्षण का आधार केवल वर्ष 2011 की जनगणना ही हो सकती है, परिवार पहचान पत्र (एफआईडीआर) का डेटा नहीं।
अदालत में दायर याचिका के अनुसार, वर्ष 2020 के चुनावों में 20 वार्डों में से 4 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थीं, जो 2011 की जनगणना पर आधारित थीं। हालांकि, सितंबर 2025 की अधिसूचना में इन्हें घटाकर 3 कर दिया गया। वार्ड नंबर-7 की पूर्व पार्षद उषा रानी सहित याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि सरकार ने जनगणना के बजाय फैमिली इंफॉर्मेशन डेटा रिपोजिटरी (एफआईडीआर) का इस्तेमाल किया, जो स्वैच्छिक है और जनगणना का विकल्प नहीं हो सकता।
खंडपीठ ने पाया कि सरकार एक ही चुनाव प्रक्रिया में दो अलग-अलग मानक अपना रही है। सरकार ने कुल सीटों के निर्धारण के लिए तो जनगणना को आधार माना लेकिन एससी सीटों में कटौती के लिए एफआईडीआर और मौके के सर्वे का सहारा लिया। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243-पी (जी) और 243-टी के तहत जनसंख्या का अर्थ केवल आधिकारिक प्रकाशित जनगणना ही है।
हरियाणा परिवार पहचान अधिनियम, 2021 का उपयोग एससी वर्ग की जनसंख्या निर्धारित करने के लिए नहीं किया जा सकता। यदि भौगोलिक सीमा बदली है, तो नई सीमाओं के भीतर 2011 की जनगणना के आंकड़ों को जोड़कर या घटाकर ही गणना करनी होगी। हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद पंचकूला नगर निगम चुनाव के लिए वार्डबंदी और आरक्षण प्रक्रिया को फिर से संशोधित करना होगा। अब प्रशासन को 2011 की जनगणना के आधार पर ही आरक्षित वार्डों का निर्धारण करना होगा, जिससे आरक्षित सीटों की संख्या फिर से 4 होने की संभावना है।