Bihar: बिहार चुनाव पर कितना असर डालेगी राहुल की यात्रा, 25 जिलों की जिन 183 सीटों को साधा; वहां क्या समीकरण?

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राहुल ने जिन क्षेत्रों में यात्रा की वहां मौजूदा समय में चुनावी समीकरण क्या हैं? यात्रा के दौरान इससे कौन-कौन से विवाद जुड़े? राहुल की यात्रा से बिहार के हालात किस तरह बदल सकते हैं? वोटर अधिकार रैली के बावजूद बिहार में कांग्रेस को अभी किस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की बिहार में 16 दिन तक चली वोटर अधिकार यात्रा सोमवार को पटना में समाप्त हो गई। इस यात्रा के दौरान लोकसभा में विपक्ष के नेता ने कई मुद्दे उठाए। इनमें चुनाव आयोग (ईसी) के विशेष गहन पुनर्निरीक्षण (एसआईआर) से लेकर वोटरों के नाम कटने के मुद्दे अहम रहे। दूसरी तरफ राहुल ने भाजपा पर ‘वोट चोरी’ के आरोप भी लगाए और बिहार में बेरोजगारी-उद्योगों की कमी को लेकर नीतीश सरकार पर भी निशाना साधा।

1300 किलोमीटर लंबी इस यात्रा में राहुल ने बिहार के कुल 25 जिलों में दस्तक दी। राहुल ने जिन क्षेत्रों में यात्रा की वहां मौजूदा समय में चुनावी समीकरण क्या हैं? यात्रा के दौरान इससे कौन-कौन से विवाद जुड़े? राहुल की यात्रा से बिहार के हालात किस तरह बदल सकते हैं? वोटर अधिकार रैली के बावजूद बिहार में कांग्रेस को अभी किस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है? 

पहले जानें- राहुल ने किन-किन जिलों की कौन सी सीटों को साधा?
राहुल गांधी की यात्रा बिहार के सासाराम से स्वतंत्रता दिवस के एक दिन बाद यानी 16 अगस्त को शुरू हुई थी। वोटर अधिकार रैली के नाम से निकाली गई इस यात्रा में राहुल ने रोहतास (सासाराम) के बाद औरंगाबाद, नालंदा, गया, नवादा, जमुई, लखीसराय, शेखपुरा, मुंगेर, भागलपुर, कटिहार, पूर्णिया, अररिया, सुपौल, मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, पूर्व चंपारण (मोतीहारी), पश्चिम चंपारण, गोपालगंज, सीवान, सारण, भोजपुर और पटना जैसे शहरों में दस्तक दी।
क्या हैं इन जिलों की सीटों पर सियासी समीकरण?

  • बिहार में 2020 में हुए चुनावों की बात करें तो कांग्रेस ने 243 सीटों में से कुल 70 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। इनमें से उसके सिर्फ 19 प्रत्याशी विधायक बनने में सफल हुए थे। अब अगर राहुल के यात्रा रूट को देखा जाए तो सामने आता है कि उन्होंने 25 जिलों का दौरा किया।
  • इन जिलों का दौरा कर राहुल ने कुल मिलाकर 183 सीटों को साधने की कोशिश की है। हालांकि, चौंकाने वाली बात यह है कि 2020 के चुनाव में कांग्रेस को इनमें से सिर्फ 14 सीटें ही हासिल हुई थीं, जबकि भाजपा को 64, राजद को 52 और जदयू को 31 सीटें मिली थीं। बाकी सीटें कुछ छोटे दलों को मिली थीं।

किन-किन विवादों में घिरी राहुल की रैली?

राहुल की वोटर अधिकार रैली ने हजारों की संख्या में लोगों को अपनी तरफ आकर्षित किया। हालांकि, उनकी यात्रा ने विवादों को भी उसी तरह अपनी तरफ खींचा।

1. पीएम मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर भड़की भाजपा
राहुल की रैली में सबसे बड़ा विवाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर की गई एक आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद उभरा। दरअसल, हुआ कुछ यूं कि जब राहुल की रैली दरभंगा जिले में थी, तब एक सभा के बाद भाजपा के खिलाफ जमकर नारेबाजी हो रही थी। यही नारेबाजी अचानक प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों के इस्तेमाल में बदल गई। भाजपा ने इसे प्रधानमंत्री की मां के खिलाफ टिप्पणी बताते हुए राहुल की रैली पर जबरदस्त वार किए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर भाजपा आलाकमान ने इसे ओछी हरकत करार दिया।

खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को इसे लेकर दुख जाहिर किया और कहा कि यह बिहार की मां-बेटी और बहनों का अपमान है। मां को गाली देने से बड़ा पाप और कुछ नहीं हो सकता। इस पूरे विवाद को लेकर भाजपा ने 4 सितंबर को बिहार बंद का आह्वान किया है।

2. स्टालिन की मौजूदगी
राहुल की यात्रा में दूसरा विवाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के आने से भड़का। दरअसल, स्टालिन 27 अगस्त को मुजफ्फरपुर में यात्रा से जुड़े थे। इसे लेकर भाजपा ने सवाल उठाते हुए कहा था कि द्रमुक नेता सनातन धर्म को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हैं, बिहार के लोगों को गाली देते हैं और राजद-कांग्रेस के लोग इन्हें अपने साथ यात्रा में लेकर चलते हैं।

दरअसल, स्टालिन की पार्टी के सांसद दयानिधि मारन का दिसंबर 2023 में एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने बिहार के लोगों को टॉयलेट साफ करने वाला करार दिया था। उन्होने कहा था कि यूपी-बिहार के लोग, जिन्होंने सिर्फ हिंदी पढ़ी है, वे तमिलनाडु में सड़क निर्माण करते हैं और टॉयलेट साफ करने का काम करते हैं। वहीं, अंग्रेजी जानने वाले बच्चों को आईटी सेक्टर में अच्छी तनख्वाह मिलती है।

दूसरी तरफ स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन भी सनातन धर्म को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी कर चुके हैं।

यात्रा से ये विवाद भी जुड़े

  • वोटर अधिकार रैली की शुरुआत के दौरान ही राहुल गांधी के बेड़े से टकराकर एक पुलिस कॉन्स्टेबल चोटिल हो गया था। इसके बाद भाजपा ने संवेदनहीनता और हुड़दंग को लेकर कांग्रेस को घेरा था।
  • रैली के बीच महागठबंधन की साथी पार्टी- राजद से भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं की नाराजगी की खबरें आईं। मोतिहारी में रैली की तैयारियों के बीच नेताओं में राजद या कांग्रेस के पोस्टर लगाने को लेकर केस तक दर्ज हो गए।
  • पूर्णिया में कांग्रेस नेताओं की यात्रा के दौरान आपस में ही कलह सामने आ गई। दरअसल, यहां की सदर सीट पर दो दावेदारों के पोस्टर फटे मिले, जिसके बाद इन नेताओं के बीच तनाव देखने को मिला।

राहुल की यात्रा से किस तरह बदल सकते हैं हालात?

1. पार्टियों के साथ आने से
राहुल गांधी की यात्रा में अलग-अलग दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया। इनमें बिहार में महागठबंधन के साथी- राजद के तेजस्वी यादव और वीआईपी के मुकेश सहनी शामिल रहे। दूसरी तरफ राज्य के बाहर की भी कई पार्टियों ने यात्रा में राहुल का साथ दिया। इनमें द्रमुक के मुखिया और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन से लेकर उद्धव शिवसेना के संजय राउत तक शामिल रहे।

2. मुद्दों पर सहमति बनने से
राहुल गांधी की यात्रा का पूरा फोकस बिहार में होने वाले विधानसभा चुनावों पर था। बिहार में चुनाव आयोग की तरफ से कराए जा रहे विशेष गहन पुनर्निरीक्षण (एसआईआर) को लेकर महागठबंधन के सभी साथी साथ दिखे। राजद, वाम दल और कांग्रेस ने रैली के दौरान ही आरोप लगाया कि यह सिर्फ वोटरों के नाम काटने का अभियान नहीं, बल्कि ऐसे समुदायों को सीधे तौर पर निशाना बनाने की साजिश है, जो इन दलों को वोट देते हैं। राहुल की रैली के दौरान कांग्रेस ने मुख्य तौर पर भाजपा को निशाना बनाया। पार्टी ने ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ का नारा दिया, जो कि पूरी रैली के दौरान गूंजता रहा।

कांग्रेस के सामने कौन सी मुश्किलें अभी भी खड़ीं?

राहुल गांधी की बिहार रैली ने भले ही पूरे देश में सुर्खियां बटोरी हों, लेकिन बिहार में उसके लिए आगे भी बड़ी चुनौतियां हैं।

1. गठबंधन की मुश्किलें
2020 के बिहार चुनाव में कांग्रेस ने 70 में से 19 सीटें जीतीं। यानी उसका स्ट्राइक रेट करीब 27 फीसदी का रहा, जो कि सहयोगी दलों- राजद (स्ट्राइक रेट- 52%) और भाकपा माले (63.15), भाकपा (33.33) और माकपा (50%) से कम रहा था। ऐसे में महागठबंधन के सामने कांग्रेस को ज्यादा सीटें देना बड़ी चुनौती होगी। दूसरी तरफ इस रैली के बावजूद बिहार में मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर कोई घोषणा या इशारा नहीं हुआ है।

2. भाजपा-जदयू की मजबूत जोड़ी
बिहार में बीते 20 वर्षों में जब कांग्रेस साझेदार के तौर पर सत्ता में आई, तब जनता दल यूनाइटेड यानी नीतीश कुमार की पार्टी महागठबंधन का हिस्सा थी। मौजूदा समय में भाजपा और जदयू साथ में एनडीए का हिस्सा हैं, जो कि मजबूती से चुनाव में उतरने की बात कह रहे हैं। राहुल की रैली को भी इन दलों ने ‘राजनीतिक शोबाजी’ करार दिया है और सरकार पर आरोप लगाने के अलावा बिहार के लिए नई योजना न होने की बात कही है।

बिहार में कैसे खत्म हुआ था कांग्रेस का दौर?
बिहार में आजादी के बाद से ही कांग्रेस का लंबे समय तक दबदबा रहा। राज्य में कांग्रेस ने अलग-अलग मौकों पर सरकार बनाई। हालांकि, कांग्रेस का यह जलवा 1985 के विधानसभा चुनाव के बाद ढलान पर आ गया और इसके बाद से अब तक राज्य में कभी भी कांग्रेस अपने दम पर सरकार नहीं बना पाई है। उसके आखिरी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र 1990 में थे। तब से लेकर अब तक कांग्रेस राज्य में सत्ता और विपक्ष दोनों जगह जूनियर पार्टनर रही है।
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Author: ILMA NEWSINDIA

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