SC: महिला वकीलों के लिए POSH एक्ट लागू न करने पर सरकार-BCI को नोटिस; शहरी बेघर आश्रय बंद करने की होगी जांच|

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सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बार काउंसिल और बार एसोसिएशन में पंजीकृत महिला वकीलों के लिए कार्यस्थल पर POSH एक्ट लागू करने से जुड़ी याचिका पर विचार करने पर सहमति जताई। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र और बीसीआई को नोटिस जारी किया है।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने  पूछा कि संविधान के अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए अदालत जाने के अधिकार के तहत हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका कैसे दायर की जा सकती है? 7 जुलाई को बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि POSH कानून केवल नियोक्ता-कर्मचारी संबंध में ही लागू होता है। इसलिए महिला वकील इसके दायरे में नहीं आतीं। इसके बाद याचिकाकर्ता के वकील ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करने की प्रार्थना को हटाने पर सहमति व्यक्त की।

शीर्ष अदालत अधिवक्ता और लेखिका सीमा जोशी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम को राज्य बार काउंसिल/बार एसोसिएशन में नामांकित महिला अधिवक्ताओं पर लागू करने के निर्देश देने की मांग की गई है। अधिवक्ता रितिका वोहरा और नमन जोशी के माध्यम से दायर याचिका में महिला अधिवक्ताओं की शिकायतों की सुनवाई के लिए POSH अधिनियम के तहत आंतरिक समितियों का गठन/जारी रखने के निर्देश देने की भी मांग की गई।

याचिका में कहा गया है कि राज्य बार काउंसिल या बार एसोसिएशनों पर POSH अधिनियम की प्रयोज्यता के मुद्दे पर स्पष्ट मिसाल के अभाव में भारत में महिला वकीलों को राज्यों में असमान संरक्षण का खतरा है। कानून का मूल उद्देश्य और डिजाइन इन अधिकारों को प्रभावी बनाना है और कोई भी व्याख्या जो महिला अधिवक्ताओं को इसके संरक्षण से बाहर रखती है, वह उस सांविधानिक उद्देश्य के विपरीत है जिसे अधिनियम पूरा करना चाहता है।

नालसा से मेट्रो परियोजना के लिए दिल्ली के शहरी बेघर आश्रयों को बंद करने की जांच के आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) को डीएमआरसी के काम के कारण राष्ट्रीय राजधानी में शहरी बेघर आश्रयों के स्थानांतरण का निरीक्षण कर रिपोर्ट सौंपने को कहा। शीर्ष अदालत ईआर कुमार की 2003 की जनहित याचिका पर सुनवाई की। याचिका में दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) के निर्माण कार्य के कारण राजधानी के आनंद विहार और सराय काले खां में आठ मौजूदा आश्रय गृहों को बंद किए जाने का मुद्दा उठाया गया है।

मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई, न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ से याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि इन आश्रय स्थलों के बंद होने से सैकड़ों लोग बेघर हो जाएंगे। वकील ने बताया कि छह आश्रय स्थलों को पहले ही बंद किया जा चुका है। अब प्राधिकारी सराय काले खां और आनंद विहार स्थित आठ अन्य आश्रय स्थलों को भी बंद करने की तैयारी कर रहे हैं। यहां वर्तमान में एक हजार से अधिक बेघर लोग रह रहे हैं। दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी) ने दिल्ली मेट्रो से संबंधित चल रहे निर्माण कार्य के लिए इन आश्रयों को स्थानांतरित करने की अनुमति दे दी है, तथा स्थानांतरण के लिए वैकल्पिक स्थलों की पहचान कर ली गई है।

मुख्य न्यायाधीश ने आदेश दिया कि हम नालसा के निदेशक को नालसा के एक अधिकारी को नियुक्त करने का निर्देश देते हैं जो इस मुद्दे की जांच करेगा और एक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा (1) आश्रय गृहों में रहने वाले लोगों की संख्या… (2) क्या वैकल्पिक स्थल में लोगों को समायोजित करने की क्षमता है; (3) स्थल पर उपलब्ध सुविधाएं। पीठ ने नालसा को दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा। न्यायालय कहा कि निरीक्षण रात आठ बजे के बाद किया जाना चाहिए।  मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायालय नालसा द्वारा स्वतंत्र सत्यापन पर निर्भर करेगा।

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Author: ILMA NEWSINDIA

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