आनंदधाम के पीठाधीश्वर सद्गुरु ऋतेश्वर महाराज ने कहा कि महाकुंभ तीर्थयात्रा ही नहीं, बल्कि आत्मयात्रा भी है। महाकुंभ केवल संतों और तपस्वियों के लिए नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए है। यह साधना, सेवा और समर्पण का अवसर है। यहां आकर मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर सच्चे आत्मस्वरूप से जुड़ सकता है। सद्गुरु ऋतेश्वर महाराज से बात की नीरज मिश्रा ने….

महाकुंभ धार्मिक नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक चेतना का संगम है। यह तीर्थयात्रा नहीं, बल्कि आत्मयात्रा है। यह याद दिलाता है कि हम केवल शरीर नहीं, बल्कि अनंत चेतना हैं। जो इस सत्य को समझ लेता है, वही सच्चे अर्थों में महाकुंभ के उद्देश्य को पूर्ण करता है। यहां साधु-संत, विद्वान और भक्त आत्मबोध, विचार-विमर्श और सत्संग के मंथन के लिए जुटते हैं। इस मंथन से जो भी निकले, वह सबके लिए होगा। यह कहना है आनंदधाम के पीठाधीश्वर सद्गुरु ऋतेश्वर महाराज का। इनसे बात की नीरज मिश्रा ने….
महाकुंभ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ा एक विराट आयोजन है। जब सूर्य और बृहस्पति की विशिष्ट स्थिति बनती है, तब यह अवसर आता है। बृहस्पति, जब कुंभ राशि में प्रवेश करते हैं और सूर्य मेष राशि में होते हैं, तब यह पर्व प्रारंभ होता है। इस दौरान पृथ्वी पर एक विशेष ऊर्जा प्रवाहित होती है, जो जल और वायुमंडल को सकारात्मक शक्ति से भर देती है। दरअसल, मनुष्य की यात्रा दासोऽहम् से शुरू होती है और शिवोऽहम् तक जाती है।
दासोऽहम् का अर्थ है मैं दास हूं, एक साधक की शुरुआत भक्ति और समर्पण से होती है। यहां आत्मा स्वयं को ईश्वर के अधीन मानती है और आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए समर्पित होती है। शिवोऽहम् का अर्थ है मैं ही शिव हूं। यानी आत्म-साक्षात्कार की अवस्था। जब साधक गहरे ध्यान, साधना और आत्म-जागरण के माध्यम से परम सत्य को प्राप्त करता है, तब उसे अहसास होता है कि वह स्वयं शिवस्वरूप है।
क्या महाकुंभ आत्मज्ञान और मोक्ष का साधन है?
बिल्कुल। महाकुंभ केवल संतों और तपस्वियों के लिए नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए है। यह साधना, सेवा और समर्पण का अवसर है। यहां आकर मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर सच्चे आत्मस्वरूप से जुड़ सकता है। यदि व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ यहां आता है, तो यह एक यात्रा नहीं, बल्कि जीवन को बदलने वाली यात्रा हो सकती है।

महाकुंभ बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक यात्रा है। गंगा में स्नान करने से पहले व्यक्ति को अपने भीतर झांकना चाहिए। क्या हमने अपने मन के विकारों को धोने का प्रयास किया है? क्या हमने अपने अहंकार, क्रोध, द्वेष और वासना को जल में विसर्जित किया है? यदि व्यक्ति इन सवालों के उत्तर खोजता है और आत्मशुद्धि की दिशा में बढ़ता है, तो यही वास्तविक महाकुंभ है।
हंसते हुए। देखिए, मैं शीर्षस्थ संत को कोई सलाह तो नहीं दे सकता हूं। लेकिन उन्होंने जो कहा, वह धर्म के आधार पर कहा होगा। कई बार सच, धर्म और देशकाल के हिसाब से बदल जाता है। लेकिन मैं इतना जरूर कहूंगा कि जिस तरह से यह बातें बाहर चर्चा हो रही हैं, वह नहीं होनी चाहिए। क्योंकि इससे समाज में अच्छा संदेश नहीं जाता है।
मैं उनके अखाड़े में नहीं हूं, तो कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। लेकिन मेरा मानना है कि ऐसे पदों के लिए नियम बने हैं। इन नियमों का सख्ती से पालन किया जाए, तो ऐसी नौबत ही नहीं आएगी। सनातन धर्म वसुधैव कुटुंबकम में भरोसा रखता है। यहां सभी लोगों का सम्मान है। अगर किसी का आत्मपरिवर्तन होता है और वह आध्यात्म से जुड़ना चाहता है, तो यह अच्छी बात है। हम सबकी कोशिश भी तो यही है कि लोग सनातन से जुड़ें।
देखिए, यह सवाल वह लोग उठा रहे हैं, जो खुद वीआईपी या वीवीआईपी हैं। यह महाकुंभ अखाड़ों, संतों-महंतों और आम लोगों का है। यह सही बात है कि यहां पर वीआईपी कल्चर की समीक्षा करने की जरूरत है। वीआईपी के लिए कोई दिन या समय तय कर दिया जाए, ताकि आम आदमी उस दिन न आए। इससे वह परेशानी से बच सकता है।
Author: planetnewsindia
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