बुजुर्गों व कवियों की सामाजिक व साहित्यिक संस्था साहित्यानंद ने मकर-संक्रांति के पावन पर्व पर कवि चैपाल का आयोजन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता रविराज सिंह ने की। कवि चैपाल का कुशल संचालन मुरारी लाल शर्मा ने किया।
अध्यक्ष द्वारा मां सरस्वती के छवि चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन करने के बाद शायर याकूब खां ने भावपूर्ण सरस्वती वंदना प्रस्तुत करने के बाद मधुर स्वर में गजल प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह माना हमारी जरूरत नहीं है, मोहब्बत तुम्हारी हकीकत नहीं है। मेरे दिल के अरमां का किया खून जब से मेरे दिल के बचने की हालत नहीं है ।। इसके बाद कवि शैलेश अवस्थी ने अपने भाव काव्य बद्ध किए- निर्दोषों मासूमों का कत्ले आम कर दिया, कायराना और घिनौना काम कर दिया इसके बाद वीरेंद्र जैन नारद ने सुनाया-आओ हम तुम मिलकर सारे एक नया निर्माण करें विश्व गुरु भारत को बनाकर जग में ऊंची शान करें इसके बाद विष्णु कुमार शर्मा ने सुनाया नई क्रांति के साथ मनाएं पर्व मकर संक्रांति का विष्णु का संदेश है जग को यही प्रेम सुख शांति का। मुरारी लाल शर्मा मधुर ने सुनाया-भेड़ सदा मुड़ती रही जिसकी खींचती ऊन निर्दोषों का देश में सदाबहा है खून इसके बाद कवि रामनिवास उपाध्याय ने सुनाया-तकरीरे मुहब्बत तकरार बन गई है आतंकियों की फितरत खूंखार बन गई है रविराज सिंह ने सुनाया -जब जब अंगठी की आंच धसक जाती है पिट्ठी बन दाल अध गली रह जाती है तब तब मुन्नू की मां बहुत याद आती है। इसके बाद अध्यक्ष उद्बोधन और मकर संक्रांति पर्व की शुभकामनाओं के साथ गोष्टी के औपचारिक समापन की घोषणा की गई।
Author: Sunil Kumar
SASNI, HATHRAS