स्टेट टीबी ऑफिसर डॉ. राजेश राजू ने बताया, ट्रायल के दौरान माइक्रोबायोलॉजिस्ट व एआई अपनी-अपनी रिपोर्ट तैयार करेंगे। इसमें दोनों की सटीकता देखी जाएगी।

हरियाणा में टीबी के खिलाफ लड़ाई अब तकनीक के सहारे और मजबूत होने जा रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से टीबी जांच में तेजी और सटीकता आने के बाद अब स्वास्थ्य विभाग मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी (एमडीआर-टीबी) की पहचान भी एआई के जरिए करने की तैयारी में है। करनाल और रोहतक की लैब में इसका जल्द ट्रायल शुरू होगा। विभाग का दावा है कि नई तकनीक से जांच रिपोर्ट कम समय में मिलेगी। ह्यूमन एरर की संभावना खत्म होगी और मरीजों का इलाज समय रहते शुरू कर उन्हें जल्द स्वस्थ किया जा सकेगा।
एमडीआर-टीबी एक गंभीर रोग है। यह तब होता है, जब टीबी के बैक्टीरिया टीबी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दो सबसे प्रभावी मुख्य दवाओं (रिफैम्पिसिन और आइसोनियाजिड) के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं। यह स्थिति मुख्य रूप से तब पैदा होती है जब मरीज अपनी टीबी का इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं या डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाओं को नियमित रूप से नहीं खाते हैं। किसी एमडीआर टीबी के मरीज के सीधे संपर्क में आने से भी यह संक्रमण हो सकता है। अभी इसकी जांच ट्रेंड माइकोबायोजिस्ट करते हैं और जांच रिपोर्ट मैन्युअल तरीके से तैयार की जाती है। इसमें मानवीय त्रुटियों की संभावना ज्यादा रहती है। ऐसे में एआई अब इस समस्या को पूरी तरह से खत्म कर सकता है।
स्टेट टीबी ऑफिसर डॉ. राजेश राजू ने बताया, ट्रायल के दौरान माइक्रोबायोलॉजिस्ट व एआई अपनी-अपनी रिपोर्ट तैयार करेंगे। इसमें दोनों की सटीकता देखी जाएगी। ट्रायल सफल रहा तो एआई माइक्रोबायोलाजिस्ट की मदद करेगा और एआई ही इस रिपोर्ट को निश्चय पोर्टल में अपलोड करेगा। उन्होंने कहा इससे समय पर रिपोर्ट तो मिलेगी साथ ही मरीज का जल्द इलाज शुरू किया जा सकेगा। एमडीआर में यदि जल्दी इलाज शुरू कर दिया जाए तो मरीज की जान बचाई जा सकेगी और संक्रमण पर भी लगाम कसी जा सकेगी।