घटिया खाद और कीटनाशकों का असर सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है बल्कि पर्यावरण और फसल पर भी पड़ रहा है। ये मिट्टी और पानी को दूषित कर सकते हैं। ऐसे उत्पाद कीटों को प्रभावी ढंग से खत्म नहीं कर पाते जिससे फसल खराब होने का खतरा बना रहता है।

पंजाब में नकली और घटिया खाद व बीजों की बिक्री लगातार बढ़ रही है। इसका सीधा असर लोगों की सेहत और खेती दोनों पर पड़ रहा है।
रसायन और उर्वरक मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020-21 में नकली खाद के 198 मामले सामने आए थे जो 2025-26 में बढ़कर 330 हो गए। पिछले खरीफ और रबी सीजन में भी मिलावट का खेल बड़े स्तर पर जारी रहा। बीजों के मामलों में स्थिति यह है कि हर 38 में से एक सैंपल फेल हो रहा है। जांच बढ़ाने के बावजूद इस पर पूरी तरह रोक नहीं लग पा रही और हर साल मामलों में बढ़ोतरी हो रही है।
वर्ष 2020-21 में विभाग ने बीजों के 3636 सैंपल लिए जिनमें से 138 मानकों पर खरे नहीं उतरे। इसके बाद 106 विक्रेताओं को चेतावनी नोटिस जारी किए गए और 78 मामलों में बिक्री पर रोक लगाई गई। वहीं 2024-25 में 5612 सैंपल लिए गए जिनमें 148 फेल रहे। इसके बाद 144 मामलों में चेतावनी नोटिस और 64 मामलों में बिक्री बंद करने के आदेश जारी हुए। तीन मामलों में अदालत से सजा सुनाई जा चुकी है जबकि 11 मामले विचाराधीन हैं।
पर्यावरण व फसल को भी नुकसान
घटिया खाद और कीटनाशकों का असर सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है बल्कि पर्यावरण और फसल पर भी पड़ रहा है। ये मिट्टी और पानी को दूषित कर सकते हैं। ऐसे उत्पाद कीटों को प्रभावी ढंग से खत्म नहीं कर पाते जिससे फसल खराब होने का खतरा बना रहता है। इससे मिट्टी की उर्वरता घटती है और उत्पादन कम होता है। विशेषज्ञों के अनुसार नकली खाद और बीजों के कारण ही किसान पारंपरिक फसलों से दूर हो रहे हैं और धान-गेहूं पर निर्भरता बढ़ रही है। इस विषय पर गहन अध्ययन की जरूरत बताई जा रही है ताकि मिलावट में इस्तेमाल हो रहे खतरनाक तत्वों की पहचान हो सके।
उर्वरक नियंत्रण आदेश 1985 के तहत कार्रवाई
उर्वरक नियंत्रण आदेश (एफसीओ) 1985 के तहत तय मानकों पर खरा नहीं उतरने वाला कोई भी खाद कृषि उपयोग के लिए बेचा नहीं जा सकता। ऐसे उत्पादों के निर्माण और बिक्री पर सख्त प्रतिबंध है। नकली या घटिया उर्वरक और कीटनाशकों की बिक्री पर राज्य सरकारें एफसीओ 1985 और आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के तहत कार्रवाई कर सकती हैं और जुर्माना भी लगा सकती हैं।
बीज परीक्षण के लिए 60 दिन की समय सीमा
देश में सार्वजनिक क्षेत्र की 178 अधिसूचित बीज परीक्षण प्रयोगशालाएं हैं। बीज परीक्षण का समय फसल के अनुसार अलग-अलग होता है जिसकी जानकारी बीज परीक्षण मैनुअल में दी गई है। बीज नियंत्रण आदेश 1983 के तहत परीक्षण के परिणाम घोषित करने के लिए अधिकतम 60 दिन का समय निर्धारित है। सरकार ने साथी पोर्टल के माध्यम से बीज उत्पादन की डिजिटल ट्रेसिबिलिटी भी लागू की है ताकि उत्पादन से वितरण तक पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके। इसका पहला चरण 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया जा चुका है और अब इसका विस्तार किया जा रहा है।
नकली खाद और बीजों से खतरे
नकली बीजों को आकर्षक बनाने के लिए उन पर खतरनाक केमिकल्स की कोटिंग की जाती है। ऐसे बीजों से उगी फसल का सेवन कैंसर, किडनी और लीवर रोग का कारण बन सकता है। इनमें हानिकारक पदार्थ होते हैं जो शरीर में भारी धातुओं के जमा होने का कारण बनते हैं। ऐसे खाद्य पदार्थों के सेवन से डायरिया, उल्टी, पेट दर्द और एलर्जी का खतरा बढ़ता है।
फसलों में पोषक तत्वों की कमी हो सकती है जिससे लोगों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता। किसान सीधे संपर्क में आने के कारण एलर्जी और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का शिकार हो सकते हैं।
सरकार ने चलाया विशेष अभियान
कृषि विभाग ने नकली और घटिया खाद पर रोक लगाने के लिए विशेष टीमें गठित की हैं। पिछले वर्ष अप्रैल और जून में अभियान चलाकर 737 सैंपल लिए गए थे जिनमें कुछ फेल पाए गए। इसके बाद दो मामलों में एफआईआर दर्ज की गई। हाल ही में मलेरकोटला में अनधिकृत खाद और कीटनाशक भंडारण के मामले में एक फर्म के खिलाफ कार्रवाई भी की गई है।
नकली बीजों पर सख्ती के निर्देश
कृषि विभाग ने अधिकारियों को नकली बीजों की बिक्री के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। वर्ष 2024-25 में 5218 बीजों के नमूनों की जांच में 137 फेल पाए गए। 4465 कीटनाशकों के नमूनों में 116 मानकों पर खरे नहीं उतरे। इसके बाद 116 कंपनियों के लाइसेंस रद्द किए गए और पांच एफआईआर दर्ज हुईं। 3592 उर्वरकों के नमूनों में 96 अमानक पाए गए जिन पर 102 लाइसेंस रद्द और आठ एफआईआर दर्ज की गईं।
स्वास्थ्य के लिए खतरनाक
पीजीआई के प्रोफेसर प्रो. रविंद्र खैवाल के अनुसार नकली और मिलावटी खाद व बीज किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए गंभीर खतरा हैं। इनमें अधिक मात्रा में रसायन और भारी धातुएं होती हैं जो त्वचा और आंखों में जलन, श्वसन रोग, पाचन तंत्र की गड़बड़ी, किडनी और लीवर को नुकसान, तंत्रिका तंत्र पर असर और कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बन सकती हैं। ऐसे उत्पाद फसलों की गुणवत्ता भी घटा रहे हैं। उन्होंने किसानों को मिट्टी का हेल्थ कार्ड बनवाने की सलाह दी ताकि कमी वाले तत्वों की पूर्ति की जा सके।
मिट्टी के संतुलन पर असर
विशेषज्ञों के अनुसार नकली उर्वरक मिट्टी में जहरीली भारी धातुएं मिला देते हैं जो लाभकारी सूक्ष्मजीवों को खत्म कर देते हैं। इससे मिट्टी का संतुलन बिगड़ता है और जड़ों तक पानी व हवा का पहुंचना मुश्किल हो जाता है। मिलावटी खाद में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम जैसे आवश्यक तत्वों की कमी होती है जिससे फसल में पोषण घटता है और उपज प्रभावित होती है।
पंजाब में नकली खाद और बीजों का बढ़ता कारोबार न केवल किसानों की मेहनत पर पानी फेर रहा है बल्कि लोगों की सेहत के लिए भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है। जांच और कार्रवाई के बावजूद इस पर पूरी तरह रोक नहीं लग पा रही है जिससे इस समस्या के स्थायी समाधान की जरूरत महसूस की जा रही है।
नकली उर्वरक मिट्टी में जहरीली भारी धातुएं मिला देते हैं। ये लाभकारी सूक्ष्मजीवों को मारकर मिट्टी के संतुलन को बिगाड़ देते हैं, जिससे जड़ों तक पानी और हवा का पहुंचना मुश्किल हो जाता है। मिलावटी खाद में आवश्यक नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम की कमी होती है, जिससे इससे फसल में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। इस कारण उपज पर भी असर पड़ता है। -हर्ष नैयर, प्रोफेसर, पंजाब विश्वविद्यालय।