पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की मतगणना के साथ यह साफ हो जाएगा कि राज्य की सत्ता किसके हाथ जाएगी, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की नजर तीन अहम भौगोलिक क्षेत्रों—उत्तर बंगाल, दक्षिण-मध्य बंगाल और राढ़ बंगाल—पर टिकी है। माना जाता है कि इन्हीं क्षेत्रों के चुनावी रुझान सरकार बनाने और बिगाड़ने का काम करते हैं।

2021 में क्या रहा था समीकरण?
2021 के चुनाव में 54 सीटों वाले उत्तर बंगाल में एनडीए ने 30 सीटें जीतकर बढ़त बनाई थी, जबकि तृणमूल कांग्रेस को 24 सीटें मिली थीं। दार्जिलिंग, कूचबिहार और अलीपुरद्वार में भाजपा गठबंधन मजबूत रहा।
दक्षिण और मध्य बंगाल, जिसमें 183 सीटें हैं, तृणमूल कांग्रेस का गढ़ साबित हुआ था। यहां टीएमसी ने 153 सीटें जीतकर लगभग क्लीन स्वीप किया, जबकि एनडीए को 29 सीटें मिलीं। कोलकाता, हावड़ा और दक्षिण 24 परगना जैसे इलाकों ने सत्ता की चाभी तय की।
राढ़ बंगाल की 57 सीटों पर मुकाबला कड़ा रहा। यहां टीएमसी ने 39 सीटें जीतीं और एनडीए को 18 सीटें मिलीं। पुरुलिया और बांकुड़ा में भाजपा मजबूत रही, जबकि बीरभूम और बर्धमान में तृणमूल का प्रभाव दिखा। कुल मिलाकर 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने 215 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया, जबकि एनडीए 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्ष बना।
2016 से 2021 तक का बदलाव
2016 में तस्वीर अलग थी। उस समय तृणमूल कांग्रेस ने 211 सीटें जीती थीं, कांग्रेस को 44 और वाम दलों को 33 सीटें मिली थीं, जबकि भाजपा सिर्फ 3 सीटों पर सिमटी थी। 2021 तक आते-आते भाजपा ने जबरदस्त उछाल लेते हुए खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित कर लिया और राज्य की राजनीति दोध्रुवीय हो गई।
2026 में कहां है असली मुकाबला?
विश्लेषकों के अनुसार दक्षिण बंगाल अब भी गेमचेंजर बना हुआ है। 183 सीटों वाले इस क्षेत्र में बढ़त बनाए रखना किसी भी दल के लिए सत्ता की राह आसान कर सकता है। उत्तर बंगाल भाजपा का मजबूत आधार माना जा रहा है, जहां वह अपनी बढ़त बरकरार रखने की कोशिश में है। वहीं राढ़ बंगाल को इस बार का सबसे बड़ा स्विंग जोन माना जा रहा है, जहां मामूली बदलाव भी 15-20 सीटों का फर्क डाल सकता है।
ऐसे में 4 मई की मतगणना यह तय करेगी कि किस क्षेत्र में किसका दबदबा कायम रहा और 2026 में सत्ता की चाभी आखिर किसके हाथ लगती है।