Assi Movie Review: फिल्म नहीं, समाज की सच्चाई है ‘अस्सी’; दूसरे हाफ में थोड़ी भटकी; तापसी पर भारी कनी कुश्रुति

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Assi Movie Review in Hindi: तापसी पन्नू की फिल्म ‘अस्सी’ इस शुक्रवार रिलीज हो रही है। यह फिल्म आपको समाज की ऐसी सच्चाई से रूबरू कराती है जो आपको अंदर तक हिला कर रख देगी। पढ़िए, फिल्म ‘अस्सी’ का रिव्यू?

Assi Review Taapsee Pannu Anubhav Sinha Film Is Important And Impactful Assi  Review: काफी महत्वपूर्ण और प्रभावशाली है तापसी पन्नू की फिल्म, पढ़ें पूरा  रिव्यू, Film-review Hindi News - Hindustan

एक फिल्म जो आपको हर बीस मिनट पर याद दिलाती है कि जब आप इसे देख रहे हैं उतनी देर में देशभर में कई महिलाएं दुष्कर्म का शिकार बन चुकी हैं। ‘अस्सी’ को आप एक फिल्म की तरह नहीं देख सकते। यह एक फिल्म है भी नहीं। यह बस उस समाज की काली सच्चाई है जिसमें आप और हम सांस ले रहे हैं। यहां पढ़ें अनुभव सिन्हा ने कैसे दिखाया है ये सच?

कहानी 
कहानी स्कूल टीचर परिमा (कनी कुश्रुति) की है जो अपने पति विनय (जीशान अय्यूब) और बच्चे ध्रुव (अद्विक जायसवाल) के साथ रहती है। एक दिन स्कूल की किसी टीचर की फेयरवेल पार्टी से लौटते वक्त कुछ लड़के उसको अगवा कर लेते हैं। उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म करते है और फिर उसे बुरी हालत में पटरी के पास फेंक देते हैं।
इसके बाद शुरू होती है उसके इंसाफ की लड़ाई। इसमें उनका साथ देती हैं वकील रावी (तापसी पन्नू)। रावी, विनय के दोस्त कार्तिक (कुमुद मिश्रा) की मुंहबोली बहन हैं। कार्तिक की पत्नी कावेरी (दिव्या दत्ता) की भी एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी जिसका इंसाफ अब तक नहीं मिला। इसके चलते कार्तिक के मन में समाज और न्याय प्रणाली दोनों के प्रति नफरत घर कर चुकी है।
कहानी तब अहम मोड़ लेती है जब कोई छतरी मैन बनकर परिमा के आरोपियों में से एक ही हत्या कर देता है। क्या रावी, परिमा को इंसाफ दिला पाएगी ? कौन है वो छतरी मैन जिसने दुष्कर्मियों की हत्या की? क्या कार्तिक को भी इंसाफ मिलेगा? ये जवाब आपको फिल्म देखकर मिलेंगे।

क्या अच्छा

  • ‘फिसलने की भी एक सीमा हाेती है, कोई खूंटी तो लगानी चाहिए’
  • ‘स्कूल का रिजल्ट बेस्ट आ रहा था पर पूरा स्कूल फेल हो गया’
  • ‘किसी के मरने से अच्छा लग रहा है.. ये तो नहीं चाहिए था’
  • ‘अंदर सब बदल गया है और शीशे में सब एक सा दिखता है’
  • ‘तुम मर्दाें को भ्रम क्यों है कि गुस्सा सिर्फ तुम्हे आता है? औरत को इतना गुस्सा आता है कि दुनिया राख हो जाए बस हमको जलानी नहीं है’

इस तरह के दमदार डायलॉग इस फिल्म की बड़ी ताकत हैं। इसके अलावा कई सीन हैं जो आपको झकझोरते हैं। एक इंसान की अंदर कितनी परतें होती हैं यह फिल्म अलग अलग किरदारों के जरिए आपको दिखाती है। पहले हाफ में यह अपनी पकड़ बनाए रहती है। कहानी कसी हुई है और आप इसमें डूब चुके होते हैं।

क्या बुरा
सेकंड हाफ के बाद फिल्म की पकड़ कुछ कमजोर होती है, छतरी मैन वाला एंगल इसकी गंभीरता को हल्का बनाता है। कोर्ट रूम सीन भी कुछ अच्छे बन पड़े हैं तो कुछ लॉजिक से हटकर हैं। हालांकि, ऐसी फिल्मों में अंत में संदेश मायने रखते हैं तो फिर ये सभी बातें भूला दी जाती हैं।

अभिनय
फिल्म में सबसे मुश्किल किरदार कनी कुश्रुति ने निभाया है। दुष्कर्म पीड़िता के किरदार का दर्द, तकलीफ और गुस्सा उन्होंने बखूबी पेश किया। कई सीन में तो उन्हें देखकर आपको दर्द उठता है। गुस्से से भरे और सिस्टम से हारे एक शख्स का किरदार कुमुद मिश्रा ने बखूबरी निभाया है। कई दृश्य में उनकी चुप्पी बोलती है।
तापसी पन्नू का किरदार जितना है उन्होंने उसे बखूबी निभाया है। यकीनन वो फिल्म का पिलर हैं पर उनके हिस्से बस एक ही कमाल का सीन आया है जिसमें वो मोनोलॉग देती नजर आती हैं।
एक्टर जतिन गोस्वामी का काम बढ़िया है। मोहम्मद जीशान अय्यूब, रेवती और मनोज पहवा जैसे कलाकारों ने अपने किरदार से न्याय किया है। फिल्म में नसीरुद्दीन शाह, सुप्रिया पाठक और सीमा पहवा के भी कैमियो और स्पेशल अपीयरेंस हैं। इन्होंने भी अपना काम भरपूर किया है।

निर्देशन
बतौर निर्देशक अनुभव सिन्हा इतने सच्चे हैं कि कई सीन आपको सिहरन देते हैं। रोंगटे खड़े कर देते हैं। समाज का आईना देखकर आप हैरान रह जाते हैं।
कैमरा वर्क और बैकग्राउंड म्यूजिक मिलकर सीन को असली बनाते हैं। फिल्म में उन्होंने सिर्फ दुष्कर्म ही नहीं, बल्कि आज के समाज के बच्चे, घूसखोरी, सिस्टम फेलियर समेत कई मुद्दों पर समय–समय पर तंज किया है।
सबसे खास बात यह है कि स्क्रीन पर वो आपको हर 20 मिनट बाद याद दिलाते हैं कि समाज में क्या कुछ भयावह घट चुका है। बस अनुभव थोड़ा सा फिल्म के दूसरे हाफ में भटके नजर आए।

देखें या नहीं 
समाज के लिए बेहद जरूरी फिल्म है। यकीनन देखनी चाहिए पर ऐसी फिल्में आप थिएटर में देखने थोड़े ही जाते हैं.. तो भले ही कल को ओटीटी पर देखें पर देखें जरूर।

 

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Author: ILMA NEWSINDIA