11 जुलाई 2002 को गर्भवती वीरपाल कौर को गंभीर रूप से जली अवस्था में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया था। मरने से पहले दिए बयान में उसने अपने पति तेजा सिंह और उसके भाई बलजीत सिंह उर्फ गोगा को आरोपी बताया था।

करीब 22 वर्ष पुराने हत्या के मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए पत्नी की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रहे पति को बरी कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि अलग आवास की मांग जैसे मामूली विवाद पर गर्भवती पत्नी को जला कर मार देने की अभियोजन की कहानी न केवल अविश्वसनीय है बल्कि इसके पीछे बताया गया मकसद भी अत्यंत कमजोर है।
हाईकोर्ट ने वर्ष 2004 में लुधियाना के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के फैसले को रद्द कर दिया जिसमें तेजा सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा दी गई थी। मामला 11 जुलाई 2002 का है।
अभियोजन के अनुसार वीरपाल कौर उस समय छह से सात माह की गर्भवती थी। उनको गंभीर रूप से जली अवस्था में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया था जहां बाद में उसकी मौत हो गई।
पुलिस ने मृतका के बयान पर पति तेजा सिंह और उसके भाई बलजीत सिंह उर्फ गोगा के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया था। अभियोजन का दावा था कि वीरपाल कौर अलग रहने की मांग कर रही थी और इसी कारण दोनों भाइयों ने उसे आग के हवाले कर दिया। हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि पति-पत्नी के बीच किसी गंभीर विवाद का कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया। केवल अलग रहने की कथित मांग के आधार पर हत्या जैसे जघन्य अपराध को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
मजिस्ट्रेट ने नहीं लिया था बयान
अदालत ने मामले की नींव माने जा रहे मृत्यु कथन पर भी गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि मृत्यु कथन किसी मजिस्ट्रेट की ओर से ही नहीं बल्कि पुलिस अधिकारी ने दर्ज किया और यह स्पष्ट नहीं किया गया कि मजिस्ट्रेट को क्यों नहीं बुलाया गया। 99 प्रतिशत जलने और गंभीर श्वसन समस्या की स्थिति में पीड़िता का विस्तृत बयान देना भी न्यायालय को संदिग्ध प्रतीत हुआ। अदालत ने कथित मारपीट के आरोप को भी अविश्वसनीय माना, क्योंकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चिकित्सकीय साक्ष्यों में किसी प्रकार की बाहरी चोट दर्ज नहीं थी। हाईकोर्ट ने यह तथ्य भी महत्वपूर्ण माना कि आरोपियों ने स्वयं पीड़िता को अस्पताल पहुंचाया, इलाज का खर्च उठाया और अस्पताल संबंधी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए जो किसी हत्यारे के सामान्य आचरण से मेल नहीं खाता। इन सभी तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने तेजा सिंह को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।


