मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में मेट्रो सेवा को शुरू हुए एक महीना पूरा हो चुका है, लेकिन शुरुआती आंकड़े राजस्व और खर्च के बीच भारी असंतुलन की ओर इशारा कर रहे हैं। भोपाल मेट्रो से जहां आम जनता को यातायात में सुविधा मिली है, वहीं आर्थिक मोर्चे पर यह परियोजना फिलहाल घाटे का सौदा साबित होती नजर आ रही है। हालात ऐसे हैं कि मेट्रो की कमाई बेहद सीमित है, जबकि संचालन और रखरखाव पर होने वाला खर्च कहीं ज्यादा है।

सूत्रों के मुताबिक, रोजाना मेट्रो से यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या उम्मीद से काफी कम है। सीमित रूट, अधूरा नेटवर्क और जागरूकता की कमी के चलते लोग अब भी बस, ऑटो और निजी वाहनों को प्राथमिकता दे रहे हैं। नतीजतन टिकट से होने वाली आमदनी बेहद कम है, जबकि बिजली, स्टाफ सैलरी, सुरक्षा, तकनीकी रखरखाव और प्रशासनिक खर्च लगातार बढ़ रहा है। यही वजह है कि भोपाल मेट्रो की स्थिति को लोग “आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया” कहकर बयान कर रहे हैं।
हालांकि, मेट्रो प्रशासन का कहना है कि यह शुरुआती दौर है और किसी भी मेट्रो परियोजना को लाभ में आने में समय लगता है। अधिकारियों के मुताबिक जैसे-जैसे रूट का विस्तार होगा और ज्यादा इलाकों को मेट्रो नेटवर्क से जोड़ा जाएगा, वैसे-वैसे यात्रियों की संख्या भी बढ़ेगी। इसके साथ ही पार्किंग सुविधा, फीडर बस, डिजिटल टिकटिंग और प्रचार-प्रसार पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग मेट्रो का उपयोग करें।
वहीं, शहरी परिवहन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मेट्रो चलाना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे शहर की जरूरतों के मुताबिक व्यवहारिक और सुलभ बनाना होगा। अगर कनेक्टिविटी बेहतर नहीं हुई और आखिरी छोर तक पहुंच आसान नहीं बनाई गई, तो यात्रियों को आकर्षित करना मुश्किल रहेगा।
कुल मिलाकर, भोपाल मेट्रो के पहले महीने का अनुभव मिला-जुला रहा है। जहां यह शहर के भविष्य के लिए एक अहम कदम माना जा रहा है, वहीं मौजूदा स्थिति में इसकी आर्थिक सेहत चिंता का विषय बनी हुई है। आने वाले महीनों में सरकार और मेट्रो प्रबंधन के फैसले यह तय करेंगे कि भोपाल मेट्रो घाटे से उबरकर आम लोगों की पहली पसंद बन पाएगी या नहीं।