मुंबई नगर निगम चुनावों के नतीजों के बाद मेयर पद को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। चुनावी माहौल के दौरान उठी उस बहस ने अब और तूल पकड़ लिया है, जिसमें यह कहा गया था कि मेयर का पद केवल मराठी और हिंदू समुदाय के लिए होना चाहिए। इस बयान पर अब नवनिर्वाचित कॉर्पोरेटर सबा हारून खान ने खुलकर प्रतिक्रिया दी है और इसे संविधान के खिलाफ बताया है।

सबा हारून खान ने साफ शब्दों में कहा है कि वे भी मेयर पद की रेस में हैं और इस पद के लिए दावेदारी करना उनका संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान किसी भी नागरिक को उसकी जाति, धर्म या भाषा के आधार पर अधिकारों से वंचित नहीं करता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव जीतकर आए प्रतिनिधि को किसी भी संवैधानिक पद के लिए दावेदारी करने का पूरा हक है।
उन्होंने यह भी कहा कि मुंबई एक बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक शहर है, जहां देश के हर कोने से लोग आकर रहते और काम करते हैं। ऐसे में किसी एक समुदाय तक पद सीमित करने की सोच न केवल लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है, बल्कि सामाजिक सौहार्द को भी नुकसान पहुंचाती है। सबा हारून खान के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है और अलग-अलग दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मेयर पद को लेकर यह बहस आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है। एक ओर जहां कुछ दल मराठी अस्मिता और स्थानीय पहचान के मुद्दे को उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर संविधान, समान अधिकार और समावेशी राजनीति की बात करने वाले नेता मुखर हो रहे हैं। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि मुंबई को अगला मेयर किस राजनीतिक समीकरण और विचारधारा के तहत मिलता है।