बिहार की विधानसभा सीटों से जुड़ी खास सीरीज ‘सीट का समीकरण’ में आज गोविंगंज विधानसभा सीट की बात करेंगे। इस सीट पर 2020 में भाजपा के सुनील मणि तिवारी को जीत मिली थी।
विस्तार
बिहार की राजनीति में हर विधानसभा का एक अलग महत्व है। इस साल के अंत में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसे लेकर बिहार में राजनीति गर्म है। आने वाले दिनों में सत्ता किसके पास जाती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इस चुनावी हलचल के बीच बिहार चुनाव से जुड़ी हमारी खास सीरीज ‘सीट का समीकरण’ में आज हम आपको गोविंदगंज सीट के बारे में बताने जा रहे हैं।
पहले जानते है गोविंदगंज के बारे में
बिहार के 38 जिलों में से एक पूर्वी चंपारण जिला भी है। जिले में कुल नौ विधानसभा सीटें हैं। गोविंदगंज विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र पूर्वी चंपारण लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है। 2008 परिसीमन से पहले इसे मोतिहारी लोकसभा सीट के नाम से जाना जाता था। पूर्वी चंपारण लोकसभा में कुल छह विधानसभा सीटें आती हैं। इसमें हरसिद्धि (एससी), गोविंदगंज, केसरिया, कल्याणपुर, पिपरा, मोतिहारी विधानसभा सीटें शामिल हैं।
1952 श्योधारी पांडे को मिली जीत
1952 में इस सीट पर सबसे पहले कांग्रेस को जीत मिली थी। कांग्रेस के श्योधारी पांडे ने निर्दलीय उम्मीदवार रामदेव द्विवेदी को 3278 वोट से हरा दिया था।
ध्रुव नारायण मणि त्रिपाठी की जीत का सिलसिला
1957 में इस सीट पर कांग्रेस के ध्रुव नारायण मणि त्रिपाठी को जीत मिली। इसके बाद लंबें समय तक उनकी इस सीट पर पकड़ बनी रही। 1957 के चुनाव में ध्रुव नारायण मणि त्रिपाठी ने निर्दलीय उम्मीदवार रामदेव द्विवेदी को 3130 वोट से हरा दिया।
1962 में भी गोविंदगंज सीट पर फिर से कांग्रेस के ध्रुप नारायण मणि त्रिपाठी को जीत मिली। इस चुनाव में उन्होंने भाकपा के राम देव द्विवेदी को 3366 वोट से हरा दिया था।
1967 में एक बार फिर से कांग्रेस के ध्रुप नारायण त्रिपाठी को ही जीत मिली थी। इसके साथ ही उन्होंने जीत की हैट्रिक लगाई। इस चुनाव में उन्होंने बीजेएस के जी.एस. पांडे को 583 वोट से हरा दिया था।
1969 में बीजेएस को मिली पहली जीत
भारतीय जन संघ को गोविंदगंज सीट पर 1969 में पहली बार जीत मिली थी। इस चुनाव में बीजेएस के हरि शंकर शर्मा ने तीन बार से लगातार जीत रहे कांग्रेस के ध्रुव नारायण मणि त्रिपाठी को 66 वोट से हरा दिया था।
फिर कांग्रेस की सीट पर वापसी
1972 में एक बार फिर कांग्रेस ने इस सीट पर वापसी की। कांग्रेस ने इस बार अपना उम्मीदवार रमाशंकर पांडेय को बनाया। कांग्रेस के रमाशंकर पांडे ने कांग्रेस ऑर्गनाइजेशन के मौन मोहन प्रसाद सिंह को 8823 वोट से हरा दिया था।
इसके बाद 1977 और 1980 में भी कांग्रेस के रमाशंकर पांडे ने ही जीत दर्ज की थी। 1977 में उन्होंने जनता पार्टी के मदन मोहन प्रसाद सिंह को 14956 वोट से हरा दिया था। वहीं 1980 में भाकपा के उमाकांत शुक्ला को 3775 वोट से हरा दिया था।
योगेंद्र पांडे को मिली सीट
1985 में पहली बार गोविंदगंज सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उतरे योगेन्द्र पांडे ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार और तीन बार के विधायक रमा शंकर पांडे को 5128 वोट से हरा दिया।
1990 के चुनाव में योगेन्द्र पांडे जनता दल के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे। इस बार उन्होंने कांग्रेस के जय प्रकाश पांडे को 8514 वोट से हरा दिया था।
1995 में देवेंद्र दुबे को मिली जीत
1995 में इस सीट पर समता पार्टी के देवेंद्र नाथ दुबे को जीत मिली। उन्होंने जनता दल के जोगेंद्र पांडे को 13855 वोट से हरा दिया। 1998 में इस सीट पर उपचुनाव हुए थे। इसमें समता पार्टी के टिकट पर उतरे देवेंद्र नाथ दुबे के भाई भूपेंद्र नाथ दुबे ने जीत दर्ज की। दरअसल, 1990 के दशक वो वक्त था जब बिहार में कई बाहुबली सिसायत में आए। इस सूची में एक नाम चंपारण के देवेंद्र दुबे का भी था। उस दौर में पूरे चंपारण में देवेंद्र नाथ दुबे का दबदबा था। दुबे 35 लोगों की हत्या में आरोपी थे। 1995 में वह गोविंदगंज सीट से जेल में रहकर चुनाव जीते थे। उन पर आरोप था कि चुनाव नॉमिनेशन के दिन उन्होंने 6 लोगों को जहर देकर मार दिया था। इसमें उनका साथ करीबी श्री प्रकाश शुक्ला और राजन तिवारी ने दिया था। उसी समय राबड़ी सरकार में मंत्री और बाहुबली बृज बिहारी प्रसाद उनके विरोधी बन गए। चुनाव जीतने के बाद देवेंद्र जेल से बाहर आए। 1998 में वह ब्रज बिहार के इलाके अरेराज ब्लॉक पहुंचे। यहां उन्हें गोलियों से भून दिया गया। इसके बाद देवेंद्र के भतीजे मंटू तिवारी ने बदला लेने की कसम खाई। देवेंद्र दुबे की हत्या के 3 महीने बाद ही राजद के कद्दावर मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की हत्या आईजीआईएमएस में कर दी गई। बृज बिहारी प्रसाद की हत्या मामले में दर्ज एफआईआर में मंटू तिवारी, भूपेंद्र नाथ दुबे, श्रीप्रकाश शुक्ला सहित कई लोगों के नाम शामिल थे। देवेंद्र नाथ दुबे की हत्या के बाद गोविंदगंज सीट पर उपचुनाव हुए। इस उपचुनाव में उनके भाई भूपेंद्र नाथ दुबे को जीत मिली।
2000 में राजन तिवारी को मिली जीत
2000 के चुनाव में गोविंदगंज सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार राजन तिवारी को जीत मिली थी। राजन तिवारी कभी देवेंद्र नाथ दुबे के करीबी थे। 2000 के चुनाव में राजन तिवारी ने तत्कालीन विधायक और समता पार्टी उम्मीदवार भूपेन्द्र नाथ दुबे को 3263 वोट से हरा दिया। चुनाव के दौरान राजन जेल में बंद थे। जेल में बंद रहते उन्होंने बाहुबली देवेंद्र नाथ दुबे के भाई भूपेंद्र दुबे को चुनाव में हरा दिया।
जदयू का सीट पर कब्जा
2005 में बिहार में दो बार चुनाव हुए थे। इन दोनों ही चुनाव में जदयू ने ही जीत दर्ज की थी। 2005 फरवरी के चुनाव में जदयू की मीना द्विवेदी ने लोजपा के राजन तिवारी को 8378 वोट से हरा दिया था। मीना 1998 में जीते भूपेंद्र दुबे की पत्नी हैं। 2005 में दूसरी बार चुनाव अक्तूबर में हुए। इस चुनाव में मुकाबला पिछली बार वाला ही थी। इस बार भी मीना देवी ने लोजपा के राजन तिवारी को 16021 वोट से हरा दिया।
2010 में भी इस सीट पर जदयू को ही जीत मिली थी। जदयू की मीना देवी ने एक बार फिर जीत दर्ज की। इस बार उन्होंने लोजपा उम्मीदवार और राजन तिवारी के भाई राजू तिवारी को 8405 वोट से हरा दिया।
2015 में राजू तिवारी को जीत
पिछले चुनाव में हारे राजन तिवारी के भाई राजू तिवारी को 2015 के विधानसभा चुनाव में जीत मिली। लोजपा के राजू तिवारी ने कांग्रेस को ब्रजेश कुमार को 27920 वोट से हरा दिया था।
2020 में भाजपा को पहली जीत
2020 में इस सीट पर मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में बीच में था। इसी के साथ भाजपा ने यहां अपनी पहली जीत दर्ज की। भाजपा के सुनील मणि तिवारी ने कांग्रेस को ब्रजेश कुमार को 27780 वोट से हरा दिया।
पहले जानते है गोविंदगंज के बारे में
बिहार के 38 जिलों में से एक पूर्वी चंपारण जिला भी है। जिले में कुल नौ विधानसभा सीटें हैं। गोविंदगंज विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र पूर्वी चंपारण लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है। 2008 परिसीमन से पहले इसे मोतिहारी लोकसभा सीट के नाम से जाना जाता था। पूर्वी चंपारण लोकसभा में कुल छह विधानसभा सीटें आती हैं। इसमें हरसिद्धि (एससी), गोविंदगंज, केसरिया, कल्याणपुर, पिपरा, मोतिहारी विधानसभा सीटें शामिल हैं।
1952 श्योधारी पांडे को मिली जीत
1952 में इस सीट पर सबसे पहले कांग्रेस को जीत मिली थी। कांग्रेस के श्योधारी पांडे ने निर्दलीय उम्मीदवार रामदेव द्विवेदी को 3278 वोट से हरा दिया था।
ध्रुव नारायण मणि त्रिपाठी की जीत का सिलसिला
1957 में इस सीट पर कांग्रेस के ध्रुव नारायण मणि त्रिपाठी को जीत मिली। इसके बाद लंबें समय तक उनकी इस सीट पर पकड़ बनी रही। 1957 के चुनाव में ध्रुव नारायण मणि त्रिपाठी ने निर्दलीय उम्मीदवार रामदेव द्विवेदी को 3130 वोट से हरा दिया।
1962 में भी गोविंदगंज सीट पर फिर से कांग्रेस के ध्रुप नारायण मणि त्रिपाठी को जीत मिली। इस चुनाव में उन्होंने भाकपा के राम देव द्विवेदी को 3366 वोट से हरा दिया था।
1967 में एक बार फिर से कांग्रेस के ध्रुप नारायण त्रिपाठी को ही जीत मिली थी। इसके साथ ही उन्होंने जीत की हैट्रिक लगाई। इस चुनाव में उन्होंने बीजेएस के जी.एस. पांडे को 583 वोट से हरा दिया था।
1969 में बीजेएस को मिली पहली जीत
भारतीय जन संघ को गोविंदगंज सीट पर 1969 में पहली बार जीत मिली थी। इस चुनाव में बीजेएस के हरि शंकर शर्मा ने तीन बार से लगातार जीत रहे कांग्रेस के ध्रुव नारायण मणि त्रिपाठी को 66 वोट से हरा दिया था।
फिर कांग्रेस की सीट पर वापसी
1972 में एक बार फिर कांग्रेस ने इस सीट पर वापसी की। कांग्रेस ने इस बार अपना उम्मीदवार रमाशंकर पांडेय को बनाया। कांग्रेस के रमाशंकर पांडे ने कांग्रेस ऑर्गनाइजेशन के मौन मोहन प्रसाद सिंह को 8823 वोट से हरा दिया था।
इसके बाद 1977 और 1980 में भी कांग्रेस के रमाशंकर पांडे ने ही जीत दर्ज की थी। 1977 में उन्होंने जनता पार्टी के मदन मोहन प्रसाद सिंह को 14956 वोट से हरा दिया था। वहीं 1980 में भाकपा के उमाकांत शुक्ला को 3775 वोट से हरा दिया था।
योगेंद्र पांडे को मिली सीट
1985 में पहली बार गोविंदगंज सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उतरे योगेन्द्र पांडे ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार और तीन बार के विधायक रमा शंकर पांडे को 5128 वोट से हरा दिया।
1990 के चुनाव में योगेन्द्र पांडे जनता दल के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे। इस बार उन्होंने कांग्रेस के जय प्रकाश पांडे को 8514 वोट से हरा दिया था।
1995 में देवेंद्र दुबे को मिली जीत
1995 में इस सीट पर समता पार्टी के देवेंद्र नाथ दुबे को जीत मिली। उन्होंने जनता दल के जोगेंद्र पांडे को 13855 वोट से हरा दिया। 1998 में इस सीट पर उपचुनाव हुए थे। इसमें समता पार्टी के टिकट पर उतरे देवेंद्र नाथ दुबे के भाई भूपेंद्र नाथ दुबे ने जीत दर्ज की। दरअसल, 1990 के दशक वो वक्त था जब बिहार में कई बाहुबली सिसायत में आए। इस सूची में एक नाम चंपारण के देवेंद्र दुबे का भी था। उस दौर में पूरे चंपारण में देवेंद्र नाथ दुबे का दबदबा था। दुबे 35 लोगों की हत्या में आरोपी थे। 1995 में वह गोविंदगंज सीट से जेल में रहकर चुनाव जीते थे। उन पर आरोप था कि चुनाव नॉमिनेशन के दिन उन्होंने 6 लोगों को जहर देकर मार दिया था। इसमें उनका साथ करीबी श्री प्रकाश शुक्ला और राजन तिवारी ने दिया था। उसी समय राबड़ी सरकार में मंत्री और बाहुबली बृज बिहारी प्रसाद उनके विरोधी बन गए। चुनाव जीतने के बाद देवेंद्र जेल से बाहर आए। 1998 में वह ब्रज बिहार के इलाके अरेराज ब्लॉक पहुंचे। यहां उन्हें गोलियों से भून दिया गया। इसके बाद देवेंद्र के भतीजे मंटू तिवारी ने बदला लेने की कसम खाई। देवेंद्र दुबे की हत्या के 3 महीने बाद ही राजद के कद्दावर मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की हत्या आईजीआईएमएस में कर दी गई। बृज बिहारी प्रसाद की हत्या मामले में दर्ज एफआईआर में मंटू तिवारी, भूपेंद्र नाथ दुबे, श्रीप्रकाश शुक्ला सहित कई लोगों के नाम शामिल थे। देवेंद्र नाथ दुबे की हत्या के बाद गोविंदगंज सीट पर उपचुनाव हुए। इस उपचुनाव में उनके भाई भूपेंद्र नाथ दुबे को जीत मिली।
2000 में राजन तिवारी को मिली जीत
2000 के चुनाव में गोविंदगंज सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार राजन तिवारी को जीत मिली थी। राजन तिवारी कभी देवेंद्र नाथ दुबे के करीबी थे। 2000 के चुनाव में राजन तिवारी ने तत्कालीन विधायक और समता पार्टी उम्मीदवार भूपेन्द्र नाथ दुबे को 3263 वोट से हरा दिया। चुनाव के दौरान राजन जेल में बंद थे। जेल में बंद रहते उन्होंने बाहुबली देवेंद्र नाथ दुबे के भाई भूपेंद्र दुबे को चुनाव में हरा दिया।
जदयू का सीट पर कब्जा
2005 में बिहार में दो बार चुनाव हुए थे। इन दोनों ही चुनाव में जदयू ने ही जीत दर्ज की थी। 2005 फरवरी के चुनाव में जदयू की मीना द्विवेदी ने लोजपा के राजन तिवारी को 8378 वोट से हरा दिया था। मीना 1998 में जीते भूपेंद्र दुबे की पत्नी हैं। 2005 में दूसरी बार चुनाव अक्तूबर में हुए। इस चुनाव में मुकाबला पिछली बार वाला ही थी। इस बार भी मीना देवी ने लोजपा के राजन तिवारी को 16021 वोट से हरा दिया।
2010 में भी इस सीट पर जदयू को ही जीत मिली थी। जदयू की मीना देवी ने एक बार फिर जीत दर्ज की। इस बार उन्होंने लोजपा उम्मीदवार और राजन तिवारी के भाई राजू तिवारी को 8405 वोट से हरा दिया।
2015 में राजू तिवारी को जीत
पिछले चुनाव में हारे राजन तिवारी के भाई राजू तिवारी को 2015 के विधानसभा चुनाव में जीत मिली। लोजपा के राजू तिवारी ने कांग्रेस को ब्रजेश कुमार को 27920 वोट से हरा दिया था।
2020 में भाजपा को पहली जीत
2020 में इस सीट पर मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में बीच में था। इसी के साथ भाजपा ने यहां अपनी पहली जीत दर्ज की। भाजपा के सुनील मणि तिवारी ने कांग्रेस को ब्रजेश कुमार को 27780 वोट से हरा दिया।