दैनिक रूप सेे संस्कृत भाषा बोली जानी चाहिए-सुखवीर सिंह

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Sunil Kumar

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देवभाषा संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। वेद भी इसी भाषा में होने के कारण इसे वैदिक भाषा भी कहते हैं। संस्कृत में बहुत कम शब्दों में अधिक आशय प्रकट कर सकते हैं। इसमें जैसा लिखा जाता है, वैसा ही उच्चारण किया जाता है। संस्कृत में भाषागत त्रुटियाँ नहीं मिलती हैं।
यह बातें सासनी विजयगढ रोड स्थित श्री राधेश्याम स्वर्णकार शिशु मंदिर सासनी संकुल में प्रधानाचार्य बर्द्धबारी सुखवीर सिंह ने बताईं उन्होंने कहा कि हाथरस भाषाविद मानते हैं कि विश्व की सभी भाषाओं की उत्पत्ति का तार कहीं-न-कहीं संस्कृत से जुड़ा है। संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यंत परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है। संस्कृत की वैज्ञानिकता बड़ी-बड़ी वैज्ञानिक खोजों का आधार बनी है। वेंकट रमन, जगदीशचन्द्र बसु, आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय, डॉ. मेघनाद साहा जैसे विश्वविख्यात विज्ञानी संस्कृत भाषा से अत्यधिक प्रेम था और वैज्ञानिक खोजों के लिए ये संस्कृत को आधार मानते थे। जगदीशचन्द्र बसु ने अपने अनुसंधानों के स्रोत संस्कृत में खोजे थे। डॉ. साहा अपने घर के बच्चों की शिक्षा संस्कृत में ही कराते थे और एक विज्ञानी होने के बावजूद काफी समय तक वे स्वयं बच्चों को संस्कृत पढ़ाते थे। इसलिए हमें दैनिक बोलचाल की भाषा में बच्चों आचार्य एवं आचार्याओं को संस्कृत में करना चाहिए। इस दौरान वर्ग में प्रधानाध्यापक विपिन कुमार पालीवाल, धर्मवीर पाठक, हरिओम शरण, जिम्मी, डौली, आरती, अनुपमा आदि उपस्थित रहे।

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Author: Sunil Kumar

SASNI, HATHRAS

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