पंजाब चुनाव में डेरावाद एक असरदार कारक रहता है। कुल मिलाकर 2027 के विधानसभा चुनाव में आस्था राजनीतिक दलों के जीत-हार के समीकरण बनाने या बिगाड़ने का काम जरूर करेगी लेकिन वह एकमात्र निर्णायक फैक्टर नहीं होगी।
पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही सूबे के सियासी गलियारों में यह सवाल फिर से तैरने लगा है कि क्या आस्था ही आने वाले चुनाव में पंजाब की सत्ता का रास्ता तय करेगी?
पंजाब का भौगोलिक और सामाजिक समीकरण इस सियासी खेल को बेहद दिलचस्प बनाता है। 117 विधानसभा सीटों वाले राज्य में 69 सीटें अकेले मालवा क्षेत्र से आती हैं, जहां डेरा सच्चा सौदा समेत कई प्रमुख संप्रदायों का अनुयायी आधार काफी मजबूत माना जाता है।
दूसरी ओर दोआबा क्षेत्र में रविदासिया समुदाय से जुड़े डेरा सचखंड बल्लां का गहरा सामाजिक प्रभाव है, जो दलित राजनीति और सामाजिक चेतना के केंद्र में रहता है। इसके ठीक विपरीत, माझा क्षेत्र में अकाल तख्त साहिब और पारंपरिक सिख पंथक सोच का दबदबा अधिक है, जहां गैर-सिख या विवादित डेरों का प्रभाव बेहद सीमित रहता है।
सियासी दलों की ताजा धार्मिक गतिविधियां
चुनाव में समय रहते बढ़त बनाने और सामाजिक-धार्मिक संतुलन साधने के लिए सभी प्रमुख दल हाल के दिनों में जमीन पर खासे सक्रिय नजर आ रहे हैं। सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप) ने पारंपरिक पंथक व डेरा आउटरीच के साथ-साथ शहरी और हिंदू बहुल क्षेत्रों को साधने के लिए धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर जोर दिया है। पार्टी द्वारा विभिन्न शहरों में एक शाम शिव के नाम जैसे भक्ति कार्यक्रमों के जरिये धार्मिक सद्भाव और सांस्कृतिक जुड़ाव का सियासी संदेश देने की कोशिश की जा रही है। पंथक वोट पर भी पार्टी नजर बनाए हुए है।
भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने पंजाब में दलित मतदाताओं को साधने के लिए डेरा सचखंड बल्लां के प्रमुख संत निरंजन दास को पद्म श्री सम्मान दिए जाने के बाद डेरा प्रमुखों के साथ सीधे संवाद और आउटरीच अभियानों को तेज कर दिया है। वाराणसी से पावन माटी के जरिये समीकरण को साधने की कोशिश हो रही है।
रक्षाबंधन (रखड़ पुण्या) के मौके पर बाबा बकाला जैसे ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों पर आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल, वारिस पंजाब दे और भाजपा जैसी सभी प्रमुख पार्टियों द्वारा आयोजित समानांतर राजनीतिक-धार्मिक रैलियां यह दर्शाती हैं कि कोई भी दल आस्था से जुड़े मंचों को छोड़ने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। अकाली दल अपनी खोई हुई पंथक जमीन वापस पाने और विभिन्न सिख धड़ों की गोलबंदी का प्रयास कर रहा है।
हालांकि कांग्रेस अभी तक आस्था को साधने के ऐसे प्रयास नहीं कर रही है जैसे अन्य दल जुटे हैं। तमाम सियासी कोशिशों के बावजूद पिछले तीन-चार चुनावों के रुझान स्पष्ट संकेत देते हैं कि पंजाब का आम मतदाता अब आस्था के किसी प्रत्यक्ष या गुप्त सियासी निर्देश के बजाय अपने स्थानीय और प्रासंगिक मुद्दों को प्राथमिकता देने लगा है। जमीनी स्तर पर गाहे-बगाहे लोग अब यह स्वीकार कर रहे हैं कि धार्मिक जुड़ाव एक तरफ है और राजनीतिक फैसले दूसरी तरफ।


