झूठा दुष्कर्म केस आरोपी का जीवन बर्बाद कर सकता है, उसकी सुरक्षा भी अदालत की जिम्मेदारी

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दुष्कर्म मामलों में पीड़िता का बयान महत्वपूर्ण साक्ष्य होता है लेकिन यदि वह स्वाभाविक, भरोसेमंद और अन्य साक्ष्यों से पुष्ट नहीं है तो केवल उसी आधार पर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

High Court false misdeed case can ruin accused life ensuring safety also court responsibility

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 24 वर्ष पुराने दुष्कर्म मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि झूठा मामला किसी आरोपी का जीवन बर्बाद कर सकता है और अदालत की जिम्मेदारी उसकी भी सुरक्षा करना है।

अदालत ने इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई सात वर्ष की सजा रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।

जस्टिस सूर्य प्रताप सिंह की पीठ ने कहा कि कानून में यह कोई पूर्वधारणा नहीं है कि दुष्कर्म की शिकायत करने वाली पीड़िता हर स्थिति में सत्य ही बोलती है। इसलिए अदालत का कर्तव्य है कि वह सभी साक्ष्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन करे और केवल विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ही दोषसिद्धि दे।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दुष्कर्म मामलों में पीड़िता का बयान महत्वपूर्ण साक्ष्य होता है लेकिन यदि वह स्वाभाविक, भरोसेमंद और अन्य साक्ष्यों से पुष्ट नहीं है तो केवल उसी आधार पर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में झूठे आरोप भी सामने आते रहे हैं जिनके पीछे निजी रंजिश, बदला या अन्य कारण हो सकते हैं। झूठे आरोप न केवल आरोपी की सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाते हैं बल्कि उसके जीवन और करियर पर भी गंभीर प्रभाव डालते हैं।
अदालत ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल सिद्धांत यह है कि अभियोजन पक्ष को आरोप संदेह से परे साबित करने होते हैं। न्याय केवल पीड़ित के अधिकारों की रक्षा तक सीमित नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी निर्दोष को गलत सजा न मिले।
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Author: Farheen