सिख संगठनों का कहना है कि सिखों के सर्वोच्च तख्तों में से एक के प्रबंधन से जुड़ा कोई भी फैसला बिना व्यापक परामर्श और समुदाय की सहमति के नहीं लिया जा सकता। उनका आरोप है कि सरकार की ओर से लगातार बढ़ते प्रशासनिक हस्तक्षेप से धार्मिक स्वायत्तता प्रभावित हो रही है।

हजूर साहिब में प्रशासन के बढ़ते हस्तक्षेप से तख्त नाराज है। इसी बीच महाराष्ट्र सरकार द्वारा तख्त श्री हजूर साहिब बोर्ड एक्ट-1956 को समाप्त कर नया तख्त श्री हजूर साहिब बिल-2026 लाने की तैयारी ने विवाद को और गहरा दिया है। प्रस्तावित विधेयक को विधानसभा सत्र में पेश किए जाने की चर्चाओं के बीच शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी), तख्त के पांच प्यारों और कई सिख संगठनों ने इसका कड़ा विरोध जताया है।
तख्त श्री हजूर साहिब बोर्ड एक्ट-1956 के तहत नांदेड़ स्थित तख्त के प्रशासन, धार्मिक गतिविधियों, संपत्तियों और वित्तीय प्रबंधन के लिए वैधानिक बोर्ड की व्यवस्था की गई थी। इसी के आधार पर बोर्ड की संरचना और अधिकार तय हैं।
संभावित बदलावों पर आशंका
पंथक विशेषज्ञों के अनुसार नए कानून में बोर्ड की संरचना, सदस्य संख्या, नियुक्ति प्रक्रिया, वित्तीय प्रबंधन, ऑडिट व्यवस्था, प्रशासनिक भूमिका और धार्मिक अधिकारों के विभाजन जैसे बदलाव संभव हैं। हालांकि इसकी पुष्टि ड्राफ्ट सामने आने के बाद ही होगी।
सिख संगठनों की प्रमुख आपत्तियां
सिख संगठनों का कहना है कि बिना परामर्श कानून लाना धार्मिक स्वायत्तता के खिलाफ है। उनका आरोप है कि इससे सरकार का नियंत्रण बढ़ सकता है और तख्त की स्वतंत्र व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।