
बदलती जीवनशैली, बढ़ती शिक्षा और आर्थिक प्राथमिकताओं ने हरियाणा के परिवारों की तस्वीर बदल दी है। बड़े परिवारों की जगह अब छोटे परिवार ले रहे हैं। हम दो हमारे दो की जगह अब हम दो हमारे एक ने जगह ले ली है। घरों में बच्चों की संख्या घट रही है।
12 साल में बदला परिवारों का गणित
पिछले 12 वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो बदलाव और भी स्पष्ट दिखाई देता है। वर्ष 2012-14 के दौरान हरियाणा की कुल प्रजनन दर 2.2 थी, जो 2022-24 में घटकर 1.9 रह गई। पिछले 12 वर्षों में हरियाणा की कुल प्रजनन दर में 0.3 अंकों यानी करीब 13.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर 2.3 से घटकर 2.1 हुई, जबकि शहरी क्षेत्रों में 2.0 से घटकर 1.7 तक पहुंच गई। प्रतिशत के हिसाब से शहरों में 15 फीसदी और गांवों में 8.7 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। दिलचस्प बात यह है कि हरियाणा अब राष्ट्रीय औसत के बराबर पहुंच चुका है। वर्ष 2024 में भारत की कुल प्रजनन दर भी 1.9 दर्ज की गई है और हरियाणा भी इसी स्तर पर आ गया है। हालांकि ग्रामीण हरियाणा की प्रजनन दर अभी भी राष्ट्रीय शहरी औसत 1.5 से ऊपर है, जबकि शहरी हरियाणा देश के शहरी औसत के काफी करीब पहुंच चुका है।
प्रजनन दर : इसका मतलब बच्चा पैदा कर सकने वाली उम्र की महिलाओं (आमतौर पर 15 से 44 या 49 वर्ष) द्वारा दिए गए जन्मों की संख्या से है। इसका सबसे मुख्य पैमाना कुल प्रजनन दर है, जो यह दर्शाता है कि एक महिला अपने पूरे जीवनकाल में औसतन कितने बच्चे पैदा करती है।
प्रतिस्थापन स्तर : किसी देश या क्षेत्र की जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए आदर्श कुल प्रजनन दर 2.1 होनी चाहिए। जब किसी क्षेत्र या देश की प्रजनन दर 2.1 से नीचे गिर जाती है तो वहां की आबादी कम होने लगती है और और बुजुर्गों की संख्या बढ़ने लगती है।
आबादी घटने के साथ विकास पर भी पड़ेगा असर
सेंट्रल यूनिवर्सिटी जम्मू के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान के पूर्व डीन अश्विनी कुमान नंदा कहते हैं कि यदि टीएफआर 2.1 से कम हुआ तो इसका मतलब है कि जितने लोग दुनिया से जा रहे हैं, उतने लोग जन्म नहीं ले रहे। प्रजनन दर कम होने का सीधा असर आबादी पर पड़ेगा। आबादी कम होगी। विकास भी धीमा होगा। माइग्रेशन भी बढ़ेगा। मगर इसका असर 20 से 25 साल में देखने को मिल सकता है। अब महिलाएं पढ़ी-लिखी हैं और नौकरी कर रही हैं। परिवार नियोजन के साधन सुलभ है। इसलिए हरियाणा में प्रजनन दर कम हुई है।