राजस्थान की राजनीति में अब इस बात को लेकर मंथन चल रहा है कि महेंद्रजीत मालवीय वापसी से कांग्रेस में क्या बदलाव होगा। क्या मालवीय का चला जाना बीजेपी स्टेट लीडरशिप की विफलता है-

भगवाधारी पार्टी से मालवीय के एक्जिट और कांग्रेस में वापसी को लेकर राजस्थान में जबरदस्त सियासी हलचल देखने को मिली।बड़ा सवाल यह है कि मालवीय के आने और जाने से बीजेपी और कांग्रेस के ऐसा क्या बदल जाएगा- जिसे लेकर इतना बवाल मचा हुआ है। विधानसभा व लोकसभा चुनावों के बाद राजस्थान की सियासत अब एक बार फिर से किसी नेता की एंट्री और एक्जिट को लेकर उबाल मार रही है। करीब 23 महीने तक बीजेपी में रहे मालवीय की अब कांग्रेस आधिकारिक रूप से घर वापसी हो गई है। शुक्रवार देर रात एआईसीसी ने मालवीय की कांग्रेस में वापसी को आधिकारिक रूप से सहमति दे दी।
मार्च 2024 में भाजपा में शामिल होने के बाद उन्हें डूंगरपुर-बांसवाड़ा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाया गया। हालांकि, उन्होंने इस चुनाव में करारी हार का सामना किया और भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के राजकुमार रोत के खिलाफ करीब ढाई लाख वोटों से चुनाव गंवा दिया।
अस्तित्व कायम रखने के लिए कद्दावर नेता चाहिए-
वरिष्ठ पत्रकार मनीष गोधा का मानना है कि बीजेपी को मालवीय के एक्जिट से नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि मालवीय का नाम बड़ा है। कांग्रेस ने वर्षों तक मालवीय के भरोसे वागड़ में काम किया है। मालवीय के जाने के बाद कांग्रेस ने वहां नई लीडरशिप पर काम तो किया लेकिन वैसी मजबूती नहीं मिल पाई। बीजेपी ने क्यों मालवीय को खोया। इसकी वजह यह भी है कि बीजेपी की लोकल लीडरशिप मालवीय को एक्सेप्ट नहीं कर पा रही थी। इस वजह से मालवीय बीजेपी में एडजेस्ट नहीं हो रहे थे। बीजेपी एक तरह से मालवीय को लेकर दुविधा में थी।
लीडरशिप अलग होती तो मालवीय बीजेपी में रुक सकते थे
वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन कहते हैं कि स्थानीय बीजेपी में मालवीय को लेकर विरोध था। लेकिन स्टेट लीडरशिप मजबूत होती हो इस विरोध को थामा जा सकता था। वसुंधरा राजे अगर यहां सीएम होती तो शायद मालवीय को बीजेपी छोड़कर नहीं जाने देंती। राजनीति में जब भी खेमा बदला जाता है तो एक वाक्य बोला जाता है – दम घुट रहा था। लेकिन यहां मालवीय वाकई में ही उपेक्षा का शिकार थे। कांग्रेस के कार्यक्रमों में जहां वे अग्रिम पंक्ति में नजर आते थे वहीं बीजेपी में पांचवी-छठी पंक्ति में जाकर उन्हें जगह मिलती थी। फिर एक बार और है कि राजस्थान में हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन का रिवाज है। उन्होंने यह भी सोचा होगा कि दो साल बीजेपी में निकल गए अब कांग्रेस में आएंगे तो हो सकता है कि सरकार बने तो कुछ बड़ी जिम्मेदारी मिल जाए। वैसे भी बीजेपी में उन्हें दो मौके मिले और वे दोनों बार फेल साबित हुए इसलिए बीजेपी में उनके लिए ज्यादा कुछ बचा भी नहीं था।
डूंगरपुर व बांसवाड़ा विधानसभा सीटों की स्थिति (2008–2023)
डूंगरपुर जिले की 4 सीटें
| सीट | 2008 | 2013 | 2018 | 2023 |
|---|---|---|---|---|
| डूंगरपुर | कांग्रेस | भाजपा | कांग्रेस | कांग्रेस |
| सागवाड़ा | कांग्रेस | भाजपा | बीजेपी | बीजेपी |
| चौरासी | कांग्रेस | भाजपा | बीजेपी | बीएपी |
| आसपुर | कांग्रेस | भाजपा | भाजपा | बीएपी |
बांसवाड़ा जिले की 5 सीटें
| सीट | 2008 | 2013 | 2018 | 2023 |
|---|---|---|---|---|
| घाटोल | निर्दलीय | भाजपा | भाजपा | कांग्रेस |
| बांसवाड़ा | कांग्रेस | भाजपा | कांग्रेस | बीएपी |
| बागीदोरा | कांग्रेस | कांग्रेस | कांग्रेस | बीएपी |
| कुशलगढ़ | जनता दल | भाजपा | निर्दलीय | कांग्रेस |
| गढ़ी | कांग्रेस | भाजपा | भाजपा | बीजेपी |