सतिंदर कोहली पर 11 जुलाई 2014 में गंभीर आरोप लगने के बाद अनुबंध समाप्त किया गया था लेकिन कुछ समय बाद उसकी पुनर्बहाली कर दी गई। बहाली के पीछे राजनीतिक संरक्षण और सिफारिशों को लेकर आज भी सवाल हैं।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के 328 पावन स्वरूप गायब होने के मामले में एसजीपीसी के पूर्व अकाउंटेंट सतिंदर सिंह कोहली की गिरफ्तारी ने जांच को नया मोड़ दिया है।
पुलिस हिरासत में कोहली के खुलासों ने न केवल एसजीपीसी की कार्यप्रणाली बल्कि पंथक संस्थाओं की जवाबदेही और राजनीतिक संरक्षण पर भी सवाल खड़ा कर दिया है।
कोहली को देर रात अदालत में पेश कर पांच दिन के पुलिस रिमांड पर भेजा गया। साल 2009 में एसजीपीसी में नियुक्त कोहली की जिम्मेदारी गुरुद्वारों के खातों का ऑडिट, इंटरनल कंट्रोल और कम्प्यूटरीकरण की थी। बावजूद इसके 2020 तक इन जिम्मेदारियों में ठोस काम नहीं हुआ। इस लापरवाही को नजरअंदाज किया गया।
अकाल तख्त साहिब की रिपोर्ट व आदेशों पर, एसजीपीसी ने सिख गुरुद्वारा ज्यूडिशियल कमेटी में कोहली से करीब 7.20 करोड़ रुपये की भरपाई के लिए केस दायर कर रखा है। यह राशि, कोहली एंड एसोसिएट्स को दी गई 9 करोड़ रुपये से अधिक की अदायगी का 75 प्रतिशत हिस्सा है। हालांकि, इस केस के जरिये अब तक एक रुपया भी रिकवर नहीं हो सका है।
श्री अकाल तख्त साहिब द्वारा नियुक्त जांच आयोग ने रिपोर्ट में कहा कि यदि समय रहते इंटरनल कंट्रोल लागू होता और खातों का कम्प्यूटरीकरण होता तो पावन स्वरूपों की संख्या में बार-बार बढ़ोतरी और कमी नहीं होती। इस लापरवाही ने एसजीपीसी को आर्थिक रूप से और साख को भी नुकसान पहुंचाया।
कोहली पर 11 जुलाई 2014 में गंभीर आरोप लगने के बाद अनुबंध समाप्त किया गया था लेकिन कुछ समय बाद उसकी पुनर्बहाली कर दी गई। बहाली के पीछे राजनीतिक संरक्षण और सिफारिशों को लेकर आज भी सवाल हैं। कोहली सुखबीर सिंह बादल के कारोबारी खातों और नॉर्थ अमेरिका में गुरबाणी प्रसारण अधिकार वाली गुरबाज मीडिया कंपनी से भी जुड़े रहे। पंथक आदेशों को चुनौती देने वाले व्यक्ति की इस तरह की भागीदारी पर सवाल उठ रहे हैं।
भाई ईश्वर सिंह आयोग ने प्रिंटिंग प्रेस की लापरवाही उजागर की, लेकिन गुरुद्वारा खातों को ऑनलाइन करने और शिक्षा कोष की निगरानी में हुई चूक की गहन जांच नहीं हुई। आलोचक राजनीतिक सरपरस्ती को इसका कारण मान रहे हैं। पूर्व अकाउंटेंट की गिरफ्तारी ने जांच को गति दी है, लेकिन एसजीपीसी और अकाली नेतृत्व की पारदर्शिता को लेकर उठे सवाल अब भी सुलझाने बाकी हैं। निगाहें पुलिस जांच और अदालत के फैसले पर टिकी हैं, जो तय करेंगे कि 328 पावन स्वरूपों की इस संवेदनशील घटना में आखिर जिम्मेदारी किसकी तय होती है।