नक्सली संगठन- माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) को खत्म करने के लिए बिहार के दो जिलों में एक के बाद एक रणवीर सेना ने दो नरसंहारों को अंजाम दिया। पहला- 1996 में भोजपुर में हुआ बथानी टोला नरसंहार और दूसरा 1997 में जहानाबाद में अंजाम दिया गया लक्ष्मणपुर बाथे हत्याकांड। इसी कड़ी में अगला निशाना था- जहानाबाद का शंकरपुर बिगहा गांव, जहां 25 जनवरी 1999 का दिन खौफ का दिन साबित हुआ।

प्रकाश लुइस के इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में लिखे लेख शंकरबिगहा रिविजेटेड में बताया है कि…
इसके अलावा शंकर बिगहा में हमले में 10 लोग बुरी तरह जख्मी हुए।
गोलियों का शोर जब बंद हुआ और बारूद का धुआं जब कुछ ऊपर उठा तो पीड़ित परिवारों ने वो आवाजें सुनीं, जो कुछ महीने पहले ही बथानी टोला और लक्ष्मणपुर बाथे को दहला चुकी थीं। यह आवाज थी ‘रणवीर सेना जिंदाबाद’ और ‘रणवीर बाबा की जय’ की। घटना के चश्मदीद बताते हैं कि रणवीर सेना की यह गोलीबारी तब रुकी, जब शंकर बिगहा के करीब के गांव धेवाई और करमचंद बिगहा से ग्रामीणों ने हवाई फायरिंग की और घटनास्थल पर आने के संकेत दे दिए। इसके बाद पूरा शंकर बिगहा सीटियों की आवाज से गूंज उठा। रणवीर सेना के लोगों को यह संकेत था भाग निकलने का। इसके बाद हत्यारों की पूरी टोली वहां से भाग निकली।
शंकर बिगहा में हुए इस नरसंहार को लेकर ग्रामीणों ने कई मौकों पर प्रशासन की लेटलतीफी की शिकायत की। पीड़ितों के रिश्तेदारों का कहना था कि हमले के कुछ दिन बाद कमांडो फोर्स ने धोबी बिगहा में छापेमारी की और वहां छह हत्यारों को मजे करते देखा। दावा किया जाता है कि यह कमांडो रणवीर सेना के इन कथित कार्यकर्ताओं को मौके पर ही गोली मार देना चाहते थे। हालांकि, तब एएसपी महावीर प्रसाद जो कि एक राजपूत थे, ने हत्यारों को बचा लिया। इसके एक हफ्ते बाद 12 और लोगों को गिरफ्तार किया गया। छह लोग कई महीनों तक फरार रहे।
गांव वालों का दावा था कि इस पूरे हमले का नेतृत्व करने वाला बिनोद शर्मा पहले नक्सली था। तब पुलिस कानून व्यवस्था के नाम पर उसके घर पर छापेमारी भी करती रहती थी। हालांकि, उसके रणवीर सेना में शामिल होने के बाद उससे पूछताछ तक नहीं की जाती थी।
बेलछी, बथानी टोला और लक्ष्मणपुर बाथे की तरह शंकर बिगहा गांव में दलितों और पिछड़ी जातियों पर रणवीर सेना के हमले की कोई एक स्पष्ट वजह सामने नहीं आती। बल्कि इसे रणवीर सेना की नक्सल संगठनों और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) को खत्म करने की कोशिश के तौर पर देखा जाता है। इतना ही नहीं इस हमले में खास तौर पर दलितों को निशाना बनाया गया, ताकि मजदूरों की एकता पर जोर दे रहे वाम संगठनों को झटका दिया जा सके।
प्रशासन की भूमिका को लेकर उठे थे सवाल
इतना ही नहीं उस दौरान शंकर बिगहा के लोगों ने प्रशासन की तरफ से भी भेदभाव की शिकायत की थी। दरअसल, नरसंहार के बाद सरकार की तरफ से प्रभावितों के परिवारों को 1,20,000 रुपये देने का एलान किया गया। वहीं, इंदिरा आवास योजना के तहत 20 हजार रुपये की अतिरिक्त सहायता की घोषणा हुई। इस तरह हर पीड़ित के परिवार को 1,40,000 रुपये मुआवजे के तौर पर मिलने थे। हालांकि, यह सहायता तब सिर्फ दलितों तक ही सीमित कर दी गई और 18 साल से कम उम्र के लोगों और पिछड़ी जातियों के पीड़ितों के रिश्तेदारों को कोई मदद नहीं मिली। इस फैसले को लेकर गांव के लोगों में खासा गुस्सा भी देखने को मिला था।
Author: planetnewsindia
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