द्वारका स्थित निजी अस्पताल में जांच के दौरान बच्ची को न्यूरो फाइब्रो मैटोसिस टाइप-2 (एनएफ2) के साथ जन्मजात स्यूडो आर्थ्रोसिस का पता चला। यह हड्डियों की मजबूती और उपचार को प्रभावित करने वाली एक दुर्लभ स्थिति है।

दुर्लभ रोग से पीड़ित 9 साल की बच्ची ने खड़े होने का सपना ही छोड़ दिया था। घुटने से नीचे और एड़ी से ऊपर दोनों पैरों की हड्डियां पेंसिल की नोक की तरह कमजोर हो गई थीं। अक्सर खड़े होने पर हड्डियां टूट जाती थीं, लेकिन दोनों पैरों की सर्जरी के बाद बच्ची अब चलने में सक्षम है।
द्वारका स्थित निजी अस्पताल में जांच के दौरान बच्ची को न्यूरो फाइब्रो मैटोसिस टाइप-2 (एनएफ2) के साथ जन्मजात स्यूडो आर्थ्रोसिस का पता चला। यह हड्डियों की मजबूती और उपचार को प्रभावित करने वाली एक दुर्लभ स्थिति है। बच्ची को छह साल की उम्र में ही सर्जरी से गुजरना पड़ा था, लेकिन इसके बावजूद उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ था।
डॉ. विक्रम खन्ना ने कहा कि मुख्य चुनौती हड्डियों के सिरों का आपस में न जुड़ना था, जिसका मतलब है कि हड्डियां उम्मीद के मुताबिक ठीक नहीं हो पाईं। इसके अलावा उसकी बोन मेरो बहुत पतली थी और पूरी हड्डी की गुणवत्ता खराब थी, जिससे उपचार मुश्किल हो रहा था। डॉक्टर के अनुसार, भले ही हम उसका इलाज करने में कामयाब हो गए, लेकिन रिफ्रैक्चर का जोखिम बहुत अधिक था।
उन्होंने कहा कि डॉक्टरों ने सबसे पहले उसके दोनों पैरों से असामान्य टिस्यू वृद्धि को हटाया, जिसे हमर्टोमा कहते हैं। टिबिया को स्थिर करने के लिए एक टाइटेनियम इलास्टिक नेलिंग सिस्टम नेलिंग डाली गई और फिबुला के के-वायरिंग से अतिरिक्त सहायता प्रदान की गई। अंत में हड्डियों को जगह पर रखने और उचित उपचार को प्रोत्साहित करने के लिए एक इलिजारोव बाहरी फिक्सेटर लगाया गया।
ऑर्थोपेडिक्स और जॉइंट रिप्लेसमेंट विभाग के प्रमुख डॉ. आशीष चौधरी ने कहा कि 8 माह में एक-एक कर दोनों पैरों की सर्जरी के बाद बच्ची अब चलने में सक्षम है और कुछ ही महीनों में दोस्तों के साथ खेल सकेगी।
Author: planetnewsindia
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