
याचिका में क्वो वारंटो रिट जारी करने की मांग की गई है। इसके जरिए मुख्य चुनाव आयुक्त से यह बताने को कहा गया है कि उन्होंने किस अधिकार के तहत ऐसी शक्तियों का इस्तेमाल किया और अब भी कर रहे हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को सामूहिक रूप से हासिल हैं।
चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं। फिलहाल ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त हैं, जबकि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी चुनाव आयुक्त हैं। तीनों के बीच किसी मुद्दे पर सहमति नहीं बनने की स्थिति में फैसला बहुमत के आधार पर किया जाता है।
याचिका में उठाए गए क्या सवाल?
याचिका में कहा गया है कि हालिया मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयोग ने ऐसे कई फैसले लिए जिन पर दोनों चुनाव आयुक्त सहमत नहीं थे। याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 का भी जिक्र किया गया है। इसके मुताबिक, जहां तक संभव हो, चुनाव आयोग का काम सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए। अगर मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त किसी मामले पर अलग-अलग राय रखते हैं तो फैसला बहुमत की राय के आधार पर किया जाना चाहिए।
याचिका के अनुसार, 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच दोनों चुनाव आयुक्तों ने चुनाव आयोग की मंजूरी के बिना आयोग के नाम पर उठाए गए कदमों को लेकर कम से कम 14 अलग-अलग आपत्तियां दर्ज की थीं। याचिका में कहा गया है, “अगर संविधान के तहत बहुसदस्यीय निकाय के रूप में चुनाव आयोग को दी गई शक्ति का इस्तेमाल वास्तव में या व्यवहार में उसके भीतर मौजूद एक पद द्वारा, संविधान और 2023 के कानून के तहत जरूरी अन्य सदस्यों की भागीदारी के बिना किया जा सकता है, तो मतदाता सूची में कौन शामिल होगा और इसलिए कौन मतदान कर सकेगा, यह तय करने वाले फैसले इस गंभीर संवैधानिक सवाल को जन्म देते हैं कि क्या ऐसे फैसले उसी संवैधानिक प्राधिकरण द्वारा लिए जा रहे हैं, जिसे संविधान ने इस उद्देश्य के लिए बनाया है।”
सीईसी से अधिकार का आधार बताने की मांग
याचिका में क्वो वारंटो रिट के जरिए मुख्य चुनाव आयुक्त से इन फैसलों के लिए उनके अधिकार का आधार बताने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि अगर यह पाया जाता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने 2023 के अधिनियम की धारा 18 के तहत आयोग के उचित फैसले के बिना चुनाव आयोग की सामूहिक शक्ति का इस्तेमाल किया या अब भी कर रहे हैं, तो ऐसे अधिकार के इस्तेमाल को अमान्य घोषित किया जाना चाहिए।
याचिका में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और एसआईआर के तहत की गई सभी कार्रवाइयों, फैसलों, निर्देशों तथा उनसे जुड़े कदमों को शुरू से ही शून्य और कानूनी अधिकार के बिना घोषित करने की मांग की गई है।