पंजाब में बढ़ता खतरा: चीन के 4जी कैमरों से सैन्य जासूसी का जाल, राजस्थान तक फैला ISI-बब्बर खालसा नेटवर्क

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Farheen

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अंतरराष्ट्रीय हाईटेक जासूसी नेटवर्क में चीन निर्मित 4जी सोलर-पावर्ड सीसीटीवी कैमरों, विदेशी क्लाउड सर्वरों, यूरोप से होने वाली फंडिंग और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की कथित भूमिका सामने आई है।

Rising Threat in Punjab Web of Military Espionage Using Chinese 4G Cameras ISI-Babbar Khalsa Network

भारत के खिलाफ जासूसी के तौर-तरीके तेजी से बदल रहे हैं। अब सीमा पार से घुसपैठ या पारंपरिक जासूसों के जरिए सूचनाएं जुटाने की जगह इंटरनेट आधारित उपकरणों और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है।

सुरक्षा एजेंसियों ने हाल में ऐसे ही एक अंतरराष्ट्रीय हाईटेक जासूसी नेटवर्क का पर्दाफाश किया है, जिसमें चीन निर्मित 4जी सोलर-पावर्ड सीसीटीवी कैमरों, विदेशी क्लाउड सर्वरों, यूरोप से होने वाली फंडिंग और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की कथित भूमिका सामने आई है।

जांच एजेंसियों के अनुसार यह नेटवर्क पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर के कई संवेदनशील इलाकों में सक्रिय था। इसका मकसद भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों की गतिविधियों पर नजर रखना था। शुरुआती जांच में यह आशंका भी जताई गई है कि इस तरह की निगरानी भविष्य में किसी बड़े आतंकी हमले की तैयारी का हिस्सा हो सकती थी।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल, पंजाब पुलिस, सैन्य खुफिया इकाइयों और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों की संयुक्त कार्रवाई के दौरान इस नेटवर्क की परतें खुलीं। जांच में सामने आया कि कई रणनीतिक सैन्य क्षेत्रों और राष्ट्रीय राजमार्गों के आसपास ऐसे कैमरे लगाए गए थे जो सेना के काफिलों और सुरक्षा गतिविधियों की निगरानी कर रहे थे। 

सोलर कैमरे बने जासूसी का सबसे बड़ा हथियार

सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक इस नेटवर्क की सबसे अहम कड़ी चीन निर्मित सोलर-पावर्ड 4जी कैमरे हैं। ये सामान्य सीसीटीवी कैमरों से अलग हैं क्योंकि इन्हें बिजली आपूर्ति की जरूरत नहीं होती। इनमें लगे सोलर पैनल लंबे समय तक कैमरों को संचालित रखते हैं जिससे इन्हें दूरदराज और सुनसान स्थानों पर आसानी से लगाया जा सकता है।

इन कैमरों में 4जी सिम कार्ड और इंटरनेट मॉड्यूल लगे थे जिनके जरिए वीडियो फुटेज सीधे विदेशों में बैठे संचालकों तक पहुंच रही थी। जांच अधिकारियों के अनुसार इन उपकरणों की सबसे बड़ी विशेषता उनका रिमोट एक्सेस सिस्टम था। पाकिस्तान, दुबई और यूरोप में मौजूद हैंडलर मोबाइल एप्लिकेशन और क्लाउड आधारित प्लेटफॉर्म के माध्यम से भारत में लगे कैमरों की लाइव फुटेज कहीं से भी देख सकते थे।

सुरक्षा सूत्रों के अनुसार कई कैमरे चीनी क्लाउड सर्वरों से जुड़े हुए थे। इससे भारत के संवेदनशील इलाकों से जुड़ा डेटा विदेशी सर्वरों पर संग्रहित हो रहा था। यही वजह है कि इस मामले ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है।

सैन्य ठिकाने और राष्ट्रीय राजमार्ग थे निशाने पर

जांच में जिन इलाकों के नाम सामने आए हैं उनमें पठानकोट, जालंधर, कपूरथला, पटियाला, मोगा, अंबाला, कठुआ, बीकानेर और अलवर जैसे संवेदनशील क्षेत्र शामिल हैं। इन स्थानों का चयन उनके सैन्य महत्व को देखते हुए किया गया था।

विशेष रूप से पठानकोट-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग-44 को प्रमुख निशाना बनाया गया। यह मार्ग भारतीय सेना की रणनीतिक आवाजाही के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। पुलिस जांच के अनुसार जनवरी 2026 में पठानकोट के सुजानपुर क्षेत्र में एक दुकान किराये पर लेकर इंटरनेट से जुड़े कैमरे स्थापित किए गए थे।

ये कैमरे सेना के काफिलों की गतिविधियां रिकॉर्ड कर रहे थे और उनकी फुटेज सीधे पाकिस्तान तक पहुंच रही थी। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि सेना की आवाजाही से जुड़ी ऐसी जानकारी किसी भी शत्रु तत्व के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।

दिल्ली पुलिस और पंजाब पुलिस की बड़ी कार्रवाई

सैन्य खुफिया से मिले इनपुट के बाद अप्रैल 2026 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने बड़े स्तर पर अभियान शुरू किया। कार्रवाई के दौरान विभिन्न राज्यों से कुल 11 संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया। इनमें कई आरोपी पंजाब से जुड़े बताए गए हैं।

गिरफ्तार लोगों में मनप्रीत सिंह, अनमोल सिंह, साहिल और अतुल राठी समेत अन्य नाम शामिल हैं। जांच एजेंसियों ने इनके कब्जे से नौ चीनी सोलर-पावर्ड 4जी कैमरे, नौ सक्रिय सिम कार्ड, विदेशी पिस्तौलें, जिंदा कारतूस, हाईटेक वाई-फाई राउटर, एन्क्रिप्टेड चैट रिकॉर्ड और प्रतिबंधित सैन्य नक्शे बरामद किए हैं।

इसके बाद पंजाब पुलिस की काउंटर इंटेलिजेंस विंग ने जालंधर से सुखविंदर सिंह उर्फ सुखा को गिरफ्तार किया। आरोप है कि वह सैन्य प्रतिष्ठानों की तस्वीरें और वीडियो पाकिस्तान भेज रहा था। वहीं पठानकोट पुलिस ने बलजीत सिंह उर्फ बिट्टू को गिरफ्तार किया जिसने राष्ट्रीय राजमार्ग-44 के पास रणनीतिक स्थान पर कैमरा लगाया था।

आईएसआई और बब्बर खालसा की कथित सांठगांठ

जांच एजेंसियों का कहना है कि इस पूरे नेटवर्क के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और प्रतिबंधित खालिस्तानी आतंकी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल का गठजोड़ सक्रिय था। एजेंसियों के अनुसार आईएसआई तकनीकी योजना, उपकरणों की उपलब्धता और विदेशी फंडिंग को संचालित कर रही थी जबकि बब्बर खालसा भारत के भीतर स्थानीय मॉड्यूल और स्लीपर सेल्स को सक्रिय करने का काम कर रहा था।

पाकिस्तान में बैठे संचालक सोशल मीडिया, इंटरनेट कॉलिंग और एन्क्रिप्टेड एप्लिकेशन के माध्यम से स्थानीय नेटवर्क को निर्देश दे रहे थे। जांच में यह भी सामने आया है कि इस नेटवर्क में शामिल कई स्थानीय युवाओं को आर्थिक लालच देकर जोड़ा गया था। उन्हें 35 हजार से 50 हजार रुपये तक का भुगतान किया जाता था। इन लोगों का काम कैमरे लगाना, सिम कार्ड उपलब्ध कराना, इंटरनेट कनेक्टिविटी बनाए रखना और उपकरणों की निगरानी करना था।

यूरोप से हो रही थी फंडिंग

इस पूरे मॉड्यूल की सबसे गंभीर कड़ी विदेशों से होने वाली फंडिंग को माना जा रहा है। जांच एजेंसियों के अनुसार जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, स्पेन और मलेशिया में सक्रिय खालिस्तान समर्थक नेटवर्क इस अभियान को आर्थिक और तकनीकी सहायता उपलब्ध करा रहे थे।

कैमरे खरीदने, सिम कार्ड लेने, दुकानें किराये पर लेने और स्थानीय स्तर पर भुगतान करने के लिए विदेशों से धन भेजा जा रहा था। यह रकम सीधे बैंकिंग चैनलों के बजाय हवाला नेटवर्क, फर्जी कंपनियों, शेल खातों और डिजिटल वॉलेट्स के जरिए भारत पहुंच रही थी।

सुरक्षा एजेंसियों को यह भी संदेह है कि यही नेटवर्क ड्रग्स से अर्जित धन को वैध बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा था। जांच में पंजाब सीमा क्षेत्र में सक्रिय ड्रोन आधारित नार्को-टेरर नेटवर्क और इस जासूसी मॉड्यूल के बीच संभावित संबंध भी सामने आए हैं। अधिकारियों के अनुसार ड्रग्स तस्करी से प्राप्त धन का इस्तेमाल जासूसी तंत्र खड़ा करने में किया जा रहा था।

विदेशों में बैठे संचालकों पर शिकंजा

जांच एजेंसियों के अनुसार दुबई, जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका में बैठे कई संचालक इस नेटवर्क को चला रहे थे। इनमें कैप्टन राणा, हरविंदर सिंह संधू उर्फ रिंदा, रेशम सिंह, शमशेर सिंह, रणवीर सिंह, हरप्रीत सिंह उर्फ हैप्पी पासिया और करनवीर सिंह जैसे नाम जांच में सामने आए हैं।

ये लोग वर्चुअल नंबर, इंटरनेट कॉलिंग और एन्क्रिप्टेड ऐप्स के जरिए भारत में मौजूद मॉड्यूल से संपर्क बनाए हुए थे। केंद्र सरकार और इंटरपोल ने कुछ आरोपियों के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किए हैं। भारत ने जर्मनी और ब्रिटेन को संबंधित डोजियर भी सौंपे हैं जबकि अमेरिकी एजेंसियों के साथ भी सूचनाएं साझा की गई हैं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने हवाला चैनलों और संदिग्ध बैंक खातों की जांच तेज कर दी है।

सुरक्षा एजेंसियों का अलर्ट

इस खुलासे के बाद पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और जम्मू सीमा से जुड़े संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा ऑडिट शुरू कर दिया गया है। राष्ट्रीय राजमार्गों, सैन्य ठिकानों और कैंट क्षेत्रों के आसपास लगे निजी सीसीटीवी कैमरों की जांच की जा रही है।

काउंटर इंटेलिजेंस के सहायक महानिरीक्षक नवजोत माहल के अनुसार संदिग्ध दुकानों की निगरानी, इंटरनेट ट्रैफिक स्कैनिंग, निजी कैमरों का सत्यापन, विदेशी फंडिंग की जांच और सिम कार्ड सक्रियण की ट्रैकिंग की जा रही है।

सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक अर्पित शुक्ला का कहना है कि यह मामला केवल एक आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ नहीं बल्कि भारत के खिलाफ चल रही डिजिटल जासूसी की नई रणनीति का संकेत है। पहले जहां घुसपैठ, हथियारों और पारंपरिक जासूसों का इस्तेमाल होता था वहीं अब इंटरनेट आधारित कैमरे, क्लाउड सर्वर, ड्रोन सप्लाई, एन्क्रिप्टेड संचार और विदेशी फंडिंग के सहारे नई तरह की हाइब्रिड टेरर टेक्नोलॉजी विकसित की जा रही है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सस्ते और आसानी से उपलब्ध इंटरनेट आधारित चीनी उपकरण आने वाले समय में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। यह मामला संकेत देता है कि भविष्य के संघर्ष केवल सीमाओं पर नहीं बल्कि डेटा, कैमरों और डिजिटल नेटवर्क के माध्यम से भी लड़े जाएंगे।

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