
ऐतिहासिक स्थल राखीगढ़ी में चौथे चरण की खोदाई में कई ऐसे पुरातात्विक अवशेष मिले हैं जिनसे यहां रहे लोगों की आभूषणों और खान-पान संबधी रुचि के बारे में पता चलता है। भारतीय सर्वेक्षण विभाग की टीम 22 जनवरी से टीला नंबर एक, दो और तीन पर खोदाई कर रही है। अब तक की खोदाई में हड़प्पा संस्कृति से जुड़ीं वस्तुएं मिलीं हैं। सबसे बड़ी टीम टीला नंबर दो पर परत दर परत खोदाई कर रही है। यहां मिले मनके कार्नियन (भूरे-लाल या नारंगी रंग का अर्ध-कीमती रत्न), सेलखड़ी और चर्ट जैसे पत्थरों के हिस्सों से अनुमान लगाया जा रहा है कि हड़प्पाकालीन लोग इन्हें आभूषणों के रूप में पहनते होंगे।
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. डॉ. शुभम केवलिया ने बताया कि पहले किए गए उत्खनन में यज्ञ वेदियां और घोड़े की मृण्मूर्ति प्राप्त हुई थीं। खोदाई में मिले कंकाल के डीएनए अध्ययन से पता चला कि यहां रहने वाले लोग भारत के मूल निवासी थे। इन अवशेषों से यह भी स्पष्ट होता है कि राखीगढ़ी के लोग वैदिक परंपरा के अनुयायी थे और आर्य आगमन के मिथक को चुनौती मिलती है।
11 टीलों में बंटा पुरातात्विक स्थल 500 हेक्टेयर से अधिक में फैला
राखीगढ़ी हड़प्पाकालीन सभ्यता का सबसे बड़ा पुरातात्विक स्थल है। राखी शाहपुर और राखीखास के बीच 11 टीलों में बंटा यह पुरातात्विक स्थल 500 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला है। वर्ष 1969 में प्रोफेसर सूरज भान की ओर से किए गए अन्वेषण से यह पता चला कि राखीगढ़ी के पुरातात्विक अवशेष और बस्तियां हड़प्पाकालीन संस्कृति के प्रतीक हैं।
चौथे चरण की खोदाई में अब तक क्या-क्या निकला
- टीला नंबर दो से चूल्हा, कच्ची और पक्की ईंटे, सुराही के टुकड़े, सजी हुई सुराही के टुकड़े
- टीला नंबर तीन से किसी जानवर की हड्डियां।
खोदाई स्थल का ब्योरा
- टीला नंबर एक: यह करीब 14 मीटर ऊंचा है।
- टीला नंबर दो: यह 10 मीटर ऊंचा है।
- टीला नंबर तीन: 12 मीटर ऊंचा है।