महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार का नाम आते ही सत्ता के बड़े उलटफेर की तस्वीर सामने आ जाती है। ऐसा ही एक ऐतिहासिक घटनाक्रम साल 2019 में देखने को मिला, जब अजित पवार के महज 80 घंटे के सत्ता कदम ने पूरे राज्य की राजनीति को हिलाकर रख दिया था। इस अप्रत्याशित राजनीतिक चाल ने न सिर्फ शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की नींद उड़ा दी थी, बल्कि देशभर में सियासी चर्चाओं का बाजार भी गर्म कर दिया था।

विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद जब किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, तब सत्ता गठन को लेकर लंबा मंथन चल रहा था। इसी बीच एनसीपी नेता अजित पवार ने अचानक बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बने और अजित पवार ने डिप्टी सीएम के रूप में शपथ लेकर सभी को चौंका दिया। यह फैसला न केवल विपक्ष बल्कि उनकी अपनी पार्टी एनसीपी के लिए भी अप्रत्याशित था।
हालांकि यह सियासी दांव ज्यादा देर तक नहीं टिक सका। एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने तुरंत मोर्चा संभालते हुए पार्टी विधायकों को एकजुट किया और साफ कर दिया कि अजित पवार का फैसला पार्टी का आधिकारिक रुख नहीं है। बहुमत साबित न कर पाने की स्थिति में आखिरकार देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार को 80 घंटे के भीतर ही इस्तीफा देना पड़ा।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के गठबंधन से महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी सरकार बनी और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने। लेकिन अजित पवार का यह 80 घंटे का पावर गेम आज भी महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बड़े ट्विस्ट के तौर पर याद किया जाता है, जिसने यह साबित कर दिया कि राज्य की सियासत में अजित पवार एक ऐसे खिलाड़ी हैं, जिनका हर कदम सत्ता के समीकरण बदलने की ताकत रखता है।

