सोलर से बदली गांवों की तकदीर: बिना बिजली चल रही आटा चक्की, बंजर खेत बने हरे-भरे

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Shikha Bhardwaj

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देश के ग्रामीण इलाकों में सौर ऊर्जा अब केवल रोशनी का साधन नहीं रही, बल्कि आजीविका और खेती का मजबूत आधार बनती जा रही है। जिन गांवों में बिजली कटौती के कारण आटा चक्की बंद रहती थी और सिंचाई के अभाव में खेत वीरान पड़े रहते थे, वहां सोलर तकनीक ने नई क्रांति ला दी है। अब कई स्थानों पर आटा चक्कियां पूरी तरह सोलर पैनलों से चल रही हैं और किसानों के खेतों में सालों बाद हरियाली लौट आई है।

सोलर ने घटाया खर्चा:बिन बिजली चलने लगी आटा चक्की...जिन खेतों में उड़ती थी  धूल, वहां लहलहा रही सब्जी की फसलें - Solar Power Reduces Costs: The Flour  Mill Is Now Running ...

पहले ग्रामीणों को आटा पिसवाने के लिए दूर के कस्बों तक जाना पड़ता था। डीजल या बिजली से चलने वाली मशीनों का खर्च इतना अधिक था कि छोटे दुकानदार काम शुरू करने से कतराते थे। सोलर आधारित चक्की लगने के बाद न बिजली बिल की चिंता रही, न डीजल का झंझट। गांव के ही युवा अब चक्की चलाकर अच्छी आमदनी कमा रहे हैं। महिलाओं को भी बड़ी राहत मिली है, क्योंकि अब उनका समय और पैसा दोनों बच रहा है।

सिर्फ आटा चक्की ही नहीं, खेती के क्षेत्र में भी सोलर ने बड़ा बदलाव किया है। जिन खेतों में पानी न मिलने से धूल उड़ती थी, वहां आज टमाटर, आलू, बैंगन, मटर और हरी सब्जियों की शानदार पैदावार हो रही है। सोलर पंप के जरिए किसान जरूरत के मुताबिक सिंचाई कर पा रहे हैं। डीजल पंप पर होने वाला हजारों रुपये का मासिक खर्च लगभग खत्म हो गया है। कई किसानों का कहना है कि पहले वे साल में एक ही फसल ले पाते थे, अब दो से तीन फसलें लेना संभव हो गया है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा असर दिख रहा है। सब्जी उत्पादन बढ़ने से स्थानीय मंडियों में बिक्री हो रही है और गांव के लोगों को रोजगार मिल रहा है। कुछ परिवारों ने सोलर ऊर्जा से तेल निकालने की मशीन, मसाला पिसाई और छोटी आटा मिल भी शुरू कर दी हैं। इससे पलायन में कमी आई है और युवा गांव में ही काम करने को प्रेरित हो रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि सौर ऊर्जा ग्रामीण भारत के लिए गेम चेंजर साबित हो रही है। यदि सरकारी योजनाओं के तहत सब्सिडी और तकनीकी सहायता का दायरा और बढ़ाया जाए तो लाखों गांव ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बन सकते हैं। सोलर न केवल पर्यावरण को बचा रहा है, बल्कि किसानों और ग्रामीणों की जेब का बोझ भी हल्का कर रहा है। आने वाले समय में यही मॉडल गांवों के विकास की नई पहचान बन सकता है।

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Author: Shikha Bhardwaj

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