तीर्थराज प्रयागराज से एक माह कल्पवास के बाद लौटे आचार्य खगेन्द्र शास्त्री का शहर में जोशीला स्वागत किया गया।
गुरूवार को प्रयागराज से लौटे आचार्य का पुष्पहार पहनाकर एवं अंगवस्त्र तथा दाऊजी महाराज का छबिचित्र भेंटकर उनका स्वागत एवं सम्मान किया गया। श्री प्रयागराज के बारे में जानकारी देते हुए हुए आचार्य खगेन्द्र शास्त्री ने बताया कि समुद्र मंथन से जो अमृत निकला तो उसे अमृत को पाने के लिए देवताओं और दानवो में युद्ध हुआ जो बारह दिन चला देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के बराबर होते हैं। इसीलिए हर बारह वर्ष बाद कुंभ लगता है ऐसा माना जाता है कि हर बारह वर्ष बाद वह अमृत की बूंद है। वहां पर उत्पन्न होती है प्रकट होती है उसकी बूंद चार जगह गिरी जिन चारों जगह आज भी कुंभ लगता है। तीर्थराज प्रयाग में उज्जैन के नासिक में और हरिद्वार बारह वर्ष बाद पूर्ण कुंभ लगता है बारह-बारह वर्ष बाद पड़ जाए तो उसे महाकुंभ कहते हैं। जो एक सौ चैवालीस साल बाद इस बार तीर्थराज प्रयाग में लगा माघ मास में जो व्यक्ति तीर्थराज प्रयाग में रहकर एक महीने कल्पवास करता है। वह परमात्मा के श्री चरणों को प्राप्त होता है। कल्पवास में भूमि शयन करना नित्य संगम में स्नान करना साधु संतों की सेवा करना तथा हवन कथाओं का श्रवण करना पूजा पाठ जप तप करना आदि सम्मलित है।
Author: Sunil Kumar
SASNI, HATHRAS

