जियोट्यूब नदियों के किनारे बनाए गए धुस्सी बांधों के विकल्प के रूप में तैयार होंगे। प्लास्टिक के कट्टों में रेत भरकर उनसे दरियाओं के किनारों पर धुस्सी बांध बनाए जाते हैं।
Kपंजाब में अब दरियाओं (नदियों) के बांध जियोट्यूब से मजबूत किए जाएंगे। बाढ़ नियंत्रण के मद्देनजर सूबे में पहली बार इस नई तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस पर काम शुरू हो चुका है। फिलहाल ससराली (लुधियाना) में सतलुज नदी के किनारे जियोट्यूब को बिछाने का काम तेजी से चल रहा है।
साल 2025 जैसी बाढ़ त्रासदी का दोहराव न हो, इसके मद्देनजर पंजाब सरकार खासी गंभीर है। इसी के चलते जल स्रोत महकमा कई नई तकनीकों के साथ बाढ़ नियंत्रण कार्यों में जुटा हुआ है। महकमे की रिसर्च टीम उन तकनीकों पर लगातार काम कर रही है, जिसका इस्तेमाल उन राज्यों व देशों में किया गया है, जहां बाढ़ का खतरा ज्यादा रहता है। जियोट्यूब भी उन्हीं में से एक तकनीक है।
जियोट्यूब दरियाओं किनारे बनाए गए धुस्सी बांधों के विकल्प के रूप में तैयार होंगे। प्लास्टिक के कट्टों में रेत भरकर उनसे दरियाओं के किनारों पर धुस्सी बांध बनाए जाते हैं मगर पानी के तेज बहाव के दौरान यह बांध रिसकर बह जाते हैं। करीब 20 मीटर लंबी और 3 मीटर व्यास वाली जियोट्यूबों को दरियाओं के किनारे बिछाया जाएगा। एक विशेष तकनीक के जरिये दरिया के भीतर से ही इन ट्यूबों में रेत भरी जाएगी। किनारों पर बिछाने के बाद इन्हें मिट्टी से ढक दिया जाएगा ताकि सूरज की तेज रोशनी का इन पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
जियोट्यूब की खासियत
किनारों को कटाव से बचाने वाले जियोट्यूब बैग सिंथेटिक पॉलीमर से बनते हैं। इनमें पॉलीप्रोपाइलीन व पॉलिएस्टर का भी इस्तेमाल होता है। यह वजन में हल्के, अत्यधिक मजबूत और रसायनों व एसिड के प्रति प्रतिरोधी होते हैं। खास बात यह कि पानी के लगातार संपर्क में रहने के बाद भी यह सड़ते या गलते नहीं है और लंबे समय तक भारी दबाव को झेल सकते है। 20 से 30 साल तक इनकी मिआद बताई जा रही है।