ऑपरेशन सिन्दूर के दाैरान फिरोजपुर के गांव खाईफेमीकी में पाकिस्तानी ड्रोन से गिराई मिसाइल गिरी थी। इस हमले में सुखविंदर कौर और लखविंदर सिंह की माैत हो गई थी।

ऑपरेशन सिन्दूर की दर्दनाक यादों को समेटे गांव खाईफेमीकी आज भी उस युद्ध का गवाह है, जिसने जसवंत सिंह की जिंदगी बदल दी।
आज उसके घर पर ताला लटका है, लेकिन अंदर झांकने पर जली कार, धमाके से टूटी दीवारें और बिखरा सामान उस भयावह रात की कहानी कह देते हैं। यही वजह है कि जसवंत अब अपना घर छोड़कर गांव वरियाम वाला में रिश्तेदारों के पास रह रहा है।
जसवंत के नए ठिकाने पर पहुंचने पर दादा दर्शन सिंह, चाचा गुरबच्चन सिंह और अन्य परिजन साथ खड़े मिले। जैसे ही पुराने घर का जिक्र हुआ, जसवंत की आंखें नम हो गईं।
खुद भी एक माह अस्पताल में रहा था भर्ती
उसने बताया कि ऑपरेशन सिन्दूर की रात वह अपने घर में पशुओं को संभाल रहा था, तभी पाकिस्तानी ड्रोन से दागी गई मिसाइल ने सब कुछ उजाड़ दिया। इस हमले में उसके माता-पिता, सुखविंदर कौर और लखविंदर सिंह की मौत हो गई, जबकि वह खुद भी बुरी तरह झुलस गया और करीब एक माह तक अस्पताल में भर्ती रहा। पंजाब सरकार ने उसका इलाज करवाया, लेकिन उसके जीवन का सबसे बड़ा सहारा छिन गया।
मां-बाप की कमी हर रोज खलती है
आज भी जब जसवंत पुराने घर जाता है, तो वहां के निशान उसे अंदर तक झकझोर देते हैं और वह फूट-फूट कर रो पड़ता है। मां-बाप की कमी हर दिन उसे खलती है, लेकिन दादा और चाचा उसे कभी अकेला नहीं छोड़ते। परिवार का स्नेह ही उसके टूटे मन को संभालने का सहारा बना हुआ है और यही उसे आगे बढ़ने की ताकत देता है।
कोई मुआवजा नहीं मिला
दादा दर्शन सिंह कहते हैं कि यह जंग सरकारों के बीच थी, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कीमत एक आम परिवार ने चुकाई। दो सदस्यों की मौत के बाद भी कोई मुआवजा नहीं मिला। इसके बावजूद जसवंत ने हिम्मत नहीं हारी है। अपनों के सहारे वह दर्द को पीछे छोड़ नई जिंदगी शुरू करने की कोशिश कर रहा है—और यही उसका सबसे बड़ा साहस है।