बचपन की मासूमियत और मोबाइल का साया

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बचपन की मासूमियत और मोबाइल का साया

स्थान: डेंटल कॉलेज, अलीगढ़ के पास

आज जब देश ‘डिजिटल इंडिया’ की तेज़ रफ्तार में आगे बढ़ रहा है, उसी दौर में समाज की एक ऐसी तस्वीर सामने आती है जो सोचने पर मजबूर कर देती है। अलीगढ़ में डेंटल कॉलेज के पास सड़क किनारे बैठे कुछ मासूम बच्चे, जिनके हाथों में किताबें और कॉपियाँ होनी चाहिए थीं, आज मोबाइल फोन की छोटी-सी स्क्रीन में अपनी दुनिया तलाशते नज़र आए।

यह दृश्य केवल एक तस्वीर नहीं, बल्कि हमारे समाज की गहराती खाई की कहानी है। तकनीक जहाँ एक ओर ज्ञान और सुविधा का माध्यम बनी है, वहीं दूसरी ओर यह बचपन से किताबें छीनकर स्क्रीन थमाने का कारण भी बनती जा रही है। इन बच्चों की उम्र स्कूल जाने, सीखने और खेलने की है, लेकिन हालात उन्हें समय से पहले एक अलग ही दुनिया में धकेल रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि कम उम्र में मोबाइल और इंटरनेट की लत बच्चों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास पर नकारात्मक असर डाल सकती है। शिक्षा की कमी, सही मार्गदर्शन का अभाव और पारिवारिक परिस्थितियाँ इन बच्चों को इस दिशा में ले जा रही हैं।

यह तस्वीर हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या डिजिटल विकास के साथ हम सामाजिक जिम्मेदारियों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं? क्या सरकारी योजनाएँ, शिक्षा व्यवस्था और समाज का सहयोग वास्तव में ज़रूरतमंद बच्चों तक पहुँच पा रहा है?

इन बच्चों को सिर्फ इंटरनेट या मनोरंजन की नहीं, बल्कि बेहतर शिक्षा, सुरक्षित माहौल और उज्ज्वल भविष्य की ज़रूरत है। यह जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है कि वह ऐसे बच्चों को सही दिशा दिखाए।

यह खबर एक सवाल है—
अगर आज बचपन हाथ से फिसल गया, तो कल का भारत कैसा होगा?

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Author: planetnewsindia

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