UP: इंसेफेलाइटिस पर बड़ी जीत, इस साल नहीं हुई एक भी मौत, गोरखपुर की ये पद्धति बनी ‘रामबाण’; जानें पूरी डिटेल

Picture of ILMA NEWSINDIA

ILMA NEWSINDIA

SHARE:

उत्तर प्रदेश में एईएस और जापानी इंसेफेलाइटिस पर बड़ी सफलता मिली है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार इस साल अब तक इन बीमारियों से एक भी मौत नहीं हुई। गोरखपुर मॉडल के तहत समय पर जांच, इलाज और जागरूकता अभियान से मरीजों की संख्या और मृत्यु दर में भारी कमी आई है।

UP: Major Victory Against Encephalitis—Not a Single Death Reported This Year; Gorakhpur's Method Proves to be

प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग ने एईएस (एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम) और जेई (जापानी इंसेफेलाइटिस) पर बड़ी हद तक नियंत्रण पाने का दावा किया है। इस साल अब तक इन दोनों बीमारियों से एक भी मरीज की मौत नहीं हुई है। यानी केस फैटेलिटी रेट (सीएफआर) शून्य हो गया है। कुछ जगहों पर मरीज मिले भी हैं, लेकिन समय पर इलाज मिलने से वे ठीक हो गए।

प्रदेश में राष्ट्रीय वेक्ट बॉर्न डिजीज नियंत्रण कार्यक्रम के जरिए एईएस और जेई को पूरी तरह से खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार वर्ष 2017 तक एईएस और जेई से बड़ी संख्या में मौतें होती थीं।

उस समय एईएस का सीएफआर 13.9 प्रतिशत और जेई का 13.4 प्रतिशत था। लगातार निगरानी, समय पर जांच और इलाज की बेहतर व्यवस्था से अब इन बीमारियों पर करीब 95 प्रतिशत तक नियंत्रण पा लिया गया है।

वर्ष 2023 में एईएस के 300 मरीज मिले थे और सीएफआर 0.6 प्रतिशत था जबकि 2025 में यह संख्या करीब 150 रह गई। इस साल अब तक सिर्फ 35 मरीज मिले हैं। वहीं, जेई के 2025 में 10 मरीज मिले थे, जबकि इस साल अब तक केवल तीन मामले सामने आए हैं।

वहीं, दोनों बीमारियों में सीएफआर शून्य हो गया है। अब स्वास्थ्य विभाग एईएस-जेई नियंत्रण के गोरखपुर मॉडल को न सिर्फ अन्य मंडलों में अपनाया जा रहा है बल्कि दस्तक अभियान में मलेरिया, टीबी, कुष्ठरोग सहित अन्य बीमारियों को भी शामिल कर लिया गया है।

गोरखपुर मॉडल से एईएस-जेई पर नियंत्रण

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार पहले एईएस और जेई के मरीजों को सीधे बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर रेफर किया जाता था। इससे मेडिकल कॉलेज पर मरीजों का दबाव बढ़ जाता था और कई मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते थे।

सबसे ज्यादा प्रभावित गोरखपुर मंडल में इसके बाद विशेष रणनीति लागू की गई। स्वास्थ्य विभाग को नोडल बनाकर पंचायत, नगर निगम, पशुपालन समेत 12 विभागों की संयुक्त टीम बनाई गई। हर विभाग की जिम्मेदारी तय की गई।

स्कूलों में एक-एक शिक्षक को हेल्थ इंस्ट्रक्टर के रूप में प्रशिक्षित किया गया। किसी बच्चे को बुखार आने पर तुरंत आशा और एएनएम के जरिए उसे अस्पताल पहुंचाया जाने लगा। लक्षणों के आधार पर तत्काल जांच शुरू की गई। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर इंसेफेलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर (ईटीसी) और पीआईसीयू की व्यवस्था की गई। इसी मॉडल के कारण अब मरीजों और मौतें शून्य हो गईं।

अभियान के जरिए अन्य बीमारियों पर भी नियंत्रण का प्रयास

संक्रामक रोग नियंत्रण अभियान के नोडल अधिकारी डॉ. विकाशेंदु अग्रवाल ने बताया कि कोशिश है कि हर संक्रामक बीमारी का सीएफआर शून्य हो जाए। इसके लिए संचारी रोग नियंत्रण अभियान को पूरे प्रदेश में शुरू किया गया।

साथ ही 20 दिन का दस्तक अभियान भी इसी में शामिल कर लिया गया है। इस अभियान के जरिये बीमारियों के प्रति लोगों को जागरूक किया जा रहा है। बुखार वाले मरीज चिह्नित करके उनकी जांच कराई जा रही है। अभियान की सफलता को देखते हुए अब इसमें टीबी, मलेरिया, कुष्ठ नियंत्रण सहित अन्य कार्यक्रमों को भी जोड़ दिया गया है।

क्या कहते हैं जिम्मेदार

हमारी कोशिश है कि एईएस, जेई के साथ ही टीबी, कुष्ठ, मलेरिया सहित सभी बीमारियों पर नियंत्रण पाया जाए। बीमारियों की लगातार स्क्रीनिंग की जा रही है।  अपर मुख्य सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अमित कुमार घोष ने बताया कि अब स्क्रब टाइफस और लेप्टोस्पायरोसिस की भी जांच शुरू कराई गई है। इससे मरीज जितनी जल्दी पहचान में आते हैं, उतनी जल्द ही उपचार शुरू हो जाता है। समय से उपचार शुरू होने की वजह से बीमारी गंभीर नहीं होने पाती है।

ILMA NEWSINDIA
Author: ILMA NEWSINDIA

सबसे ज्यादा पड़ गई