आम आदमी पार्टी ने सांसद राघव चड्ढा की जगह अशोक मित्तल को राज्यसभा में पार्टी का नया उपनेता नियुक्त किया था। इसके बाद से पार्टी और राघव चड्ढा के बीच दूरियां बढ़ गई थी जो आज पार्टी में टूट के ताैर पर सामने आई।

आम आदमी पार्टी और उसके युवा चेहरे राघव चड्ढा के रास्ते अलग हो गए हैं। राघव ने भाजपा में शामिल होने का एलान किया है। उनके साथ पंजाब के सांसद अशोक मित्तल, राजेंद्र गुप्ता, संदीप पाठक, विक्रमजीत साहनी और हरभजन सिंह के भी भाजपा में जाने की बात सामने आ रही है।
कुछ दिन पहले राज्यसभा में पार्टी के उपनेता पद से चड्ढा को हटाकर उनकी जगह डॉ. अशोक कुमार मित्तल को नियुक्त किया गया था। इस फैसले ने सियासी गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए थे।
काैन हैं राघव चड्ढा
राघव चड्ढा अरविंद केजरीवाल के काफी नजदीकी माने जाते थे। आंदोलन के समय से दोनों साथ थे। चड्ढा ने आम आदमी पार्टी से अपनी राजनीति शुरू की थी। 2015 में उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया। वे 2019 में दक्षिण दिल्ली से लोकसभा चुनाव लड़े लेकिन हार गए। 2020 में राजेंद्र नगर से दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
इसके बाद उन्हें आम आदमी पार्टी का पंजाब प्रभारी बनाया गया। 21 मार्च, 2022 को आम आदमी पार्टी की तरफ से उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया गया था। राघव चड्ढा पंजाब से राज्यसभा के सबसे युवा सदस्य हैं। वे पूर्व दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष और दिल्ली के राजेंद्र नगर विधानसभा सीट से 2022 तक विधायक रह चुके हैं।
कैसे बिगड़ी थी बात
विपक्ष जहां इसे आप के अंदरूनी मतभेद का संकेत बता रहा था। वहीं पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह और नए उपनेता डॉ. अशोक कुमार मित्तल ने इसे एक सामान्य संगठनात्मक प्रक्रिया करार दिया है, जिसका मकसद अन्य सांसदों को भी जिम्मेदारी देना है।
राघव चड्ढा ने खुद को बताया दरिया
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर दो तरह की तस्वीर सामने आ रही है। एक तरफ आम आदमी पार्टी इसे सामान्य बदलाव बता रही है, वहीं दूसरी तरफ राघव चड्ढा के इशारे इसे आवाज दबाने की कार्रवाई के तौर पर पेश कर रहे हैं।
पार्टी की छवि पर असर
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह विवाद बढ़ता है, तो इसका असर पार्टी की छवि और आंतरिक संतुलन दोनों पर पड़ सकता है, खासकर ऐसे समय में जब राष्ट्रीय स्तर पर आप अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि मामला अनुशासन का है या रणनीति का, लेकिन इतना तय है कि राघव चड्ढा और आम आदमी पार्टी के बीच बढ़ती दूरी ने सियासत में नई हलचल जरूर पैदा कर दी है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यह विवाद यहीं थमता है या किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की भूमिका बनता है।


