मुख्य ग्रंथी ज्ञानी रघबीर सिंह की विदाई से पंथक राजनीति में हलचल, एसजीपीसी पर उठे सवाल

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विवाद की जड़ 2 दिसंबर 2024 का वह हुक्मनामा माना जा रहा है, जो ज्ञानी रघबीर सिंह ने अकाल तख्त के जत्थेदार रहते हुए जारी किया था। इसमें शिरोमणि अकाली दल की तत्कालीन नेतृत्व को तनखैया घोषित करते हुए पार्टी के पुनर्गठन के आदेश दिए गए थे।

Chief Granthi Giani Raghbir Singh departure stirs Panthic politics raises questions about SGPC

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने गुरुवार को श्री हरिमंदिर साहिब के मुख्य ग्रंथी और श्री अकाल तख्त साहिब के पूर्व जत्थेदार ज्ञानी रघबीर सिंह को अनुशासनहीनता और प्रबंधन को चुनौती देने के आरोप में पद से हटाकर जबरन रिटायर कर दिया।

एसजीपीसी अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने निर्णय को उचित ठहराते हुए कहा कि ज्ञानी रघबीर सिंह ने नियमों के विरुद्ध सार्वजनिक बयानबाजी की और मर्यादा के अनुरूप ड्यूटी नहीं निभाई। हालांकि पंथक हलकों में इसे महज प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि यह कदम शिरोमणि अकाली दल (बादल) और एसजीपीसी के उस गठजोड़ की प्रतिक्रिया है, जो पंथक संस्थाओं पर अपनी पकड़ कमजोर पड़ने से असहज है।

क्यों गिरी गाज? हुक्मनामा बना टकराव की जड़

विवाद की जड़ 2 दिसंबर 2024 का वह हुक्मनामा माना जा रहा है, जो ज्ञानी रघबीर सिंह ने अकाल तख्त के जत्थेदार रहते हुए जारी किया था। इसमें शिरोमणि अकाली दल की तत्कालीन नेतृत्व को तनखैया घोषित करते हुए पार्टी के पुनर्गठन के आदेश दिए गए थे। साथ ही प्रकाश सिंह बादल को दिया गया फख्र-ए-कौम खिताब भी वापस लिया गया था। इस फैसले को पंथक राजनीति में ऐतिहासिक और विवादास्पद माना गया।

इसके बाद ज्ञानी रघबीर सिंह ने एसजीपीसी में लंगर घोटाले, संपत्तियों की अवैध बिक्री और गोलक के धन में भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए। पहले उन्हें मार्च 2025 में अकाल तख्त के जत्थेदार पद से हटाया गया और अब 26 फरवरी 2026 को मुख्य ग्रंथी पद से भी सेवामुक्त कर दिया गया।

पंथक राजनीति पर असर, संस्थागत साख दांव पर

विश्लेषकों के अनुसार, यह निर्णय पंजाब में नए पंथक ध्रुवीकरण को जन्म दे सकता है। यदि सिख संगत इस कार्रवाई को आवाज दबाने के रूप में देखती है तो इसका उल्टा असर अकाली दल (बादल) पर पड़ सकता है। वहीं समर्थक इसे संगठनात्मक अनुशासन की बहाली बता रहे हैं।

एसजीपीसी पर एक परिवार के प्रभाव के आरोप भी तेज हो सकते हैं और कमेटी चुनाव की मांग जोर पकड़ सकती है। अमृतसर व ग्रामीण पंजाब में ज्ञानी रघबीर सिंह की छवि बेबाक और मर्यादा के रक्षक की रही है। उन्होंने जाते-जाते कहा है कि वे भ्रष्टाचार के सबूत संगत के सामने रखेंगे। स्पष्ट है कि यह फैसला केवल एक पद परिवर्तन नहीं, बल्कि पंजाब की पंथक राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत है। आने वाले समय में इसका असर एसजीपीसी की विश्वसनीयता और अकाली दल की सियासी स्थिति पर गहरा पड़ सकता है।

सच की आवाज दबाई गई, वडाला का एसजीपीसी पर हमला

श्री हरिमंदिर साहिब के पूर्व हजूरी रागी और सिख सद्भावना दल के मुखी भाई बलदेव सिंह वडाला ने कहा कि ज्ञानी रघबीर सिंह को पद से हटाकर एसजीपीसी ने साबित कर दिया है कि सच बोलने वालों की आवाज दबाई जाती है। उन्होंने कहा कि जब 2 दिसंबर 2024 को अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार रहते हुए ज्ञानी रघबीर सिंह ने अकाली दल बादल नेतृत्व के खिलाफ हुक्मनामा जारी किया था, तभी तय हो गया था कि उन्हें किसी न किसी बहाने पद से हटाया जाएगा। पहले उन्हें जत्थेदार पद से हटाया गया और अब मुख्य ग्रंथी पद से भी हटा दिया गया। वडाला ने आरोप लगाया कि एसजीपीसी और अकाली नेतृत्व पंथक मर्यादा से समझौता कर रहे हैं, जिसका जवाब पंथ जरूर मांगेगा।

सरबत खालसा बुलाने की उठी मांग, पंथक संगठनों की चुप्पी पर सवाल

इंटरनेशनल पंथक दल के नेताओं ने संयुक्त बयान जारी कर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा ज्ञानी रघबीर सिंह को सेवा मुक्त किए जाने के फैसले की कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि देश–विदेश की पंथक जत्थेबंदियों और सिख संप्रदायों की चुप्पी ने बादल दल नेताओं को पुनः मनमानी करने का अवसर दिया है। अब समय आ गया है कि श्री अकाल तख्त साहिब पर ‘सरबत खालसा’ बुलाया जाए।

इंग्लैंड से अध्यक्ष भाई रघबीर सिंह, अंतरराष्ट्रीय चीफ ऑर्गेनाइज़र भाई परमजीत सिंह ढाडी, महासचिव भाई कप्तान सिंह, इटली से प्रगट सिंह और ऑस्ट्रिया से नछत्तर सिंह ने कहा कि 2 दिसंबर 2024 को बादल परिवार के विरुद्ध जारी गुरमत आदेश के बाद संबंधित जत्थेदारों को क्रमशः अपमानित कर सेवा मुक्त किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि एसजीपीसी एक परिवार के नियंत्रण में चल रही है और नियुक्ति या सेवा मुक्ति के लिए व्यापक परामर्श का वादा भी पूरा नहीं किया गया।

सरबत खालसा ही समाधान

नेताओं ने कहा कि इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा और यूरोप की जत्थेबंदियों ने मनमानी न होने देने का संकल्प लिया था, लेकिन अधिकांश संगठन मौन रहे। अब समूची कौम को एकजुट होकर सरबत खालसा बुलाना चाहिए, ताकि पंथ के व्यापक हित में सामूहिक निर्णय लिए जा सकें।

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Author: Farheen

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