पुष्टिमार्गीय परंपराओं के अनुरूप फाल्गुन सप्तमी पर श्रीनाथजी की हवेली में पाटोत्सव श्रद्धा और उमंग के साथ आयोजित हुआ। श्रद्धालुओं ने रंग, रसिया और विशेष भोग सेवा के माध्यम से प्रभु के प्रति भक्ति अर्पित की।

फाल्गुन सप्तमी के पावन अवसर पर नाथद्वारा स्थित श्रीनाथजी मंदिर में परंपरानुसार पाटोत्सव श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। विक्रम संवत् 1728 फाल्गुन वद सातम के दिन प्रभु श्रीनाथजी को पहली बार नाथद्वारा मंदिर में तिलकायत दामोदरजी (दाऊजी) प्रथम महाराज ने पाट पर विराजित किया था। तभी से इस दिन पाटोत्सव मनाने की परंपरा चली आ रही है।
इस अवसर पर युवाचार्य गोस्वामी विशाल बावा ने पुष्टिसृष्टि को पाटोत्सव की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि पुष्टिमार्ग में पाटोत्सव का अर्थ केवल सिंहासन पर विराजना नहीं है, बल्कि यह एक विशेष, विलक्षण और अनुपम आध्यात्मिक प्रसंग है। निकुंज नायक श्रीनाथजी का पाटोत्सव समस्त वल्लभकुल में हर्ष, श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
बताया जाता है कि प्रभु ने श्री गिरधरजी से सर्वसमर्पण स्वीकार किया, जो बहू-बेटी के आभूषणों के रूप में अर्पित हुआ। इन्हीं आभूषणों से निर्मित रत्नजड़ित चौखटा आज भी विशेष उत्सवों और अवसरों पर प्रभु को अर्पित किया जाता है।