बच्ची की मां ने बताया कि उसकी बेटी के साथ पार्क में दुष्कर्म किया गया था। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि घटना के बाद आरोपियों ने परिवार को धमकाया ताकि वे किसी के सामने सच न बोल दें।

नेत्रहीन बच्ची ने अपने साथ हैवानियत करने के आरोपियों की आवाज को अपनी यादों में जिंदा रखा और वही आवाजें अदालत में उसकी ताकत बनीं। उसने आरोपियों की पहचान कर ली।
इस मार्मिक मामले में पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने नाबालिग आरोपियों को जमानत देने से इन्कार करते हुए कहा कि ऐसे जघन्य अपराध में रिहाई न्याय के उद्देश्यों को विफल कर देगी और यह न्याय के साथ अन्याय होगा।
जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल ने करनाल की किशोर न्याय बोर्ड और अपीलीय अदालत के आदेशों को बरकरार रखते हुए कहा कि किशोर न्याय कानून का उद्देश्य बच्चों का सुधार है लेकिन जब अपराध की प्रकृति अत्यंत गंभीर और समाज को झकझोर देने वाली हो तब अदालत को पीड़िता और न्याय के व्यापक हितों को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
मानसिक ताैर पर भी कमजोर है पीड़िता
मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी पीड़िता का आरोपियों को पहचानना था। चूंकि बच्ची नेत्रहीन है इसलिए सामान्य मामलों की तरह वह आरोपियों को देखकर पहचान नहीं सकती थी। इसके बावजूद उसने जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान आरोपियों को उनकी आवाज के आधार पर पहचान लिया। राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि पीड़िता न केवल नेत्रहीन है बल्कि मानसिक रूप से भी कमजोर है फिर भी उसने आरोपियों की पहचान करने में कोई हिचक नहीं दिखाई।
मिट्टी खाते देख हुआ था खुलासा
मामले का खुलासा भी बेहद संवेदनशील परिस्थितियों में हुआ। करनाल की चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) के अध्यक्ष उमेश कुमार ने एक बच्ची को मिट्टी खाते देखा। स्थिति संदिग्ध लगी तो उसके बारे में जानकारी जुटाई गई। जांच में सामने आया कि बच्ची नेत्रहीन है। मानसिक रूप से कमजोर है और गर्भवती भी है। इसके बाद अधिकारियों ने परिवार से संपर्क किया।
बच्ची की मां ने बताया कि उसकी बेटी के साथ पार्क में दुष्कर्म किया गया था। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि घटना के बाद आरोपियों ने परिवार को धमकाया ताकि वे किसी के सामने सच न बोल दें।
आरोपियों की ओर से यह कहते हुए जमानत मांगी गई थी कि वे नाबालिग हैं और किशोर न्याय कानून का लाभ पाने के हकदार हैं लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि कानून सुधार का अवसर जरूर देता है परंतु यह राहत हर मामले में स्वतः नहीं मिल सकती। अदालत ने माना कि पीड़िता की स्थिति, अपराध की गंभीरता, उपलब्ध साक्ष्य और मामले के समग्र तथ्यों को देखते हुए आरोपियों को रिहा करना न्याय के हित में नहीं होगा।