सिलिंडर के दाम बढ़े: मायावती बोलीं- चुनाव काल की तरह अब भी डीजल-पेट्रोल के दाम नियंत्रित करे सरकार

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बसपा सुप्रीमो मायावती ने कॉमर्शियल गैस सिलिंडर की कीमतें बढ़ाए जाने के बाद केंद्र की सरकार को सुझाव दिया है और कहा कि गरीब व मध्यमवर्ग के लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करके ही सरकार अपनी नीतियां बनाएं।

Cylinder prices rise: Mayawati says people are restless,

कॉमर्शियल गैस सिलिंडर की कीमतों में एकमुश्त 993 रुपये बढ़ाए जाने को लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती ने एक्स पर बयान जारी करते हुए कहा कि सरकार के इस कदम से जनता में बेचैनी है। इससे आम जनता की मुश्किलें बढ़ेंगी। उन्होंने कहा कि जिस तरह विधानसभा चुनाव के दौरान पेट्रोल-डीजल के दाम नियंत्रित किए गए थे। सरकार अब भी वही तरीका अपनाएं।

उन्होंने अपने बयान में कहा कि देश में कॉमर्शियल सिलिंडर की भारी किल्लत के बीच उसकी कीमत में एक मुश्त 993 रुपयों की फिर की गयी वृद्धि व उसका आम जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभाव से जुडी खबरें इलेक्ट्रानिक सहित सभी मीडिया जगत की सुर्खियों में हैं और इस आशंका से कि जल्द ही रसोई गैस, पेट्रोल व डीजल सहित अन्य पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें भी जरूर बढ़ेंगी, लोगों में बेचैनी व्याप्त है।

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इसका वास्तविक कारण चाहे अमेरिका-इजराइल का ईरान पर युद्ध हो या अन्य कुछ और। सरकार ने जिस प्रकार से राज्यों के विधानसभा आमचुनाव के मद्देनजर खासकर पेट्रोलियम पदार्थों आदि की कीमत को काफी कुछ नियंत्रण में रखा, उस नीति को वर्तमान में भी व्यापक जनहित व जनकल्याण के तहत जारी रखना चाहिये तो यह देशहित में उचित होगा।

दिल्ली में भी नई दर पर कॉमर्शियल सिलिंडर की कीमत अब लगभग तीन हजार से अधिक हो जाएगी। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों के इस प्रकार से बढ़ने से पहले से ही महंगाई से त्रस्त देश के अधिकतर गरीब व मध्यम वर्ग के लोगों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका आकलन करके ही सरकार अपनी नीतियों का निर्धारण करे तो यह बेहतर है।

कॉमर्शियल गैस सिलिंडर की कीमतें बढ़ने के बाद अब अनुमान लगाया जा रहा है कि घरेलू गैस सिलिंडर और पेट्रोल-डीजल की कीमतें भी बढ़ेंगी।

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Author: ILMA NEWSINDIA

सबसे ज्यादा पड़ गई

हालांकि निजी अस्पतालों की बात करें तो वहां इलाज का औसत खर्च 42,359 रुपये है, जो देश के औसत 50,508 रुपये से कम है। इसके बावजूद यह खर्च आम परिवार के लिए भारी ही साबित होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि दवाइयों, जांचों और अन्य सहायक सेवाओं पर होने वाला अतिरिक्त खर्च मरीजों की जेब पर दबाव बढ़ा रहा है। सरकारी अस्पतालों में भी पूरी तरह मुफ्त या सस्ती सुविधाएं उपलब्ध न होने के कारण लोगों को बाहर से सेवाएं लेनी पड़ती हैं, जिससे कुल खर्च बढ़ जाता है। ये आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि हरियाणा में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को और किफायती बनाने की जरूरत है ताकि लोगों पर इलाज का आर्थिक बोझ कम हो सके। साथ ही, जेब से होने वाले खर्च (आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर) को घटाने के लिए प्रभावी नीतियों की भी आवश्यकता है। चेरिटेबल अस्पतालों की स्थिति बेहतर चेरिटेबल अस्पतालों में दूसरे राज्यों व राष्ट्रीय औसत के मुकाबले खर्च आधे से भी कम है। हरियाणा में प्रति इलाज चेरिटेबल अस्पताल में औसत मेडिकल खर्च 16945 रुपये है जबकि अखिल भारतीय औसत 39,530 रुपये है। एक बार भर्ती होने पर खर्च हो जाते हैं 33,713 रुपये शहरी व ग्रामीण के सरकारी व प्राइवेट अस्पताल में ओवरआल औसतन खर्च हरियाणा में सस्ता है। आंकड़ों से पता चला कि हरियाणा में अस्पताल में भर्ती होने के हर मामले पर औसत मेडिकल खर्च 33,713 आता है, जो भारतीय औसत 34,064 रुपये से थोड़ा कम है। पंजाब में औसतन खर्च 35,703 रुपये है। जिन बीमारियों में भर्ती की जरूरत नहीं होती, उसमें भी ज्यादा खर्च कुछ ऐसी बीमारियां होती हैं जिसमें भर्ती होने की जरूरत नहीं होती, उसमें भी हरियाणा में इलाज कराना काफी महंगा है। हरियाणा में प्रति इलाज गांव में औसतन 1361 रुपये और शहर में 1464 रुपये का खर्च आता है जबकि राष्ट्रीय औसत गांव में 847 रुपये है और शहर में 884 रुपये है। यानी हरियाणा में इलाज का औसत खर्च राष्ट्रीय औसत से करीब 547 रुपये (63%) अधिक है। पड़ोसी राज्य पंजाब के गांव में औसतन खर्च 1283 रुपये और शहर में 1158 रुपये है। खाने का खर्च जोड़ने से खर्चा और बढ़ता है इलाज का खर्च सिर्फ दवा और अस्पताल तक सीमित नहीं रहता बल्कि आने-जाने और खाने का खर्च जोड़ने पर यह और बढ़ जाता है। हरियाणा में एक बार इलाज पर औसतन करीब 45,183 रुपये खर्च आता है। पूरे देश में यही औसत 41,463 रुपये है। यानी हरियाणा में लोगों को राष्ट्रीय औसत के मुकाबले करीब 3,720 रुपये (9%) ज्यादा खर्च करने पड़ते हैं। दूसरी ओर, पंजाब में भी अस्पताल में भर्ती होने पर कुल औसत खर्च 42,319 रुपये है। कारण : दवाओं व सर्जिकल आइटम की कमी से बढ़ता है खर्च पीजीआई रोहतक के पूर्व सर्जन डा. रणबीर दहिया कहते हैं कि सरकारी अस्पतालों में दवाइयां कम मिलती है। डाक्टर की लिखी पांच में से सिर्फ एक या दो दवाइयां ही अस्पताल में मिलती है। बाकी दवाइयां मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ती हैं। इसी तरह से हड्डियों के ऑपरेशन में लगने वाले इंप्लांट सरकारी अस्पताल में नहीं मिलते हैं। मरीज जब बाहर से खरीदता है तो उसका खर्च तो बढ़ जाता है। कई बार अस्पतालों में इतनी भीड़ होती है या टेस्ट की वेटिंग इतनी लंबी हो जाती है कि मरीज को प्राइवेट में जांच कराना आसान लगता है। इस वजह से खर्च बढ़ता है। इलाज के लिए बार-बार अस्पताल में आने से भी खर्च बढ़ता है। वहीं, आईएमए के पूर्व प्रधान डाॅ. अजय महाजन कहते हैं कि सरकारी अस्पतालों में अक्सर देखा जाता है कि दवाइयां और सर्जिकल सामान बाहर से मंगवाया जाता है, जिसकी वजह से खर्च बढ़ जाता है। मरीज का सबसे ज्यादा खर्च दवाइयों में होता है। किस राज्य में सरकारी अस्पताल में प्रति इलाज कितना खर्च क्रमांक राज्य / केंद्र शासित प्रदेश प्रति इलाज खर्च (₹) 1 छत्तीसगढ़ 3,913 2 दिल्ली 6,394 3 मध्य प्रदेश 4,647 4 राजस्थान 4,177 5 पंजाब 12,200 6 चंडीगढ़ 24,013