हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवा से हटाने का अधिकार प्रशासनिक होते हुए भी अर्ध-न्यायिक होता है। प्राधिकरण को आरोप, साक्ष्यों और आपत्तियों का सही विश्लेषण करना आवश्यक था, जो नहीं हुआ।

कोर्ट ने पाया कि बर्खास्तगी के पीछे ठोस कारण नहीं थे और आदेश न्यायिक मानकों पर खरा नहीं उतरता।
जस्टिस कुलदीप तिवारी ने कहा कि मामला लंबे समय से लंबित था और याचिकाकर्ता अब अपने जीवन के संध्याकाल में हैं। कोर्ट ने कहा कि उनके अधिकृत प्रतिनिधियों को सुनवाई का मौका दिया जाए और छह हफ्ते में नया निर्णय लिया जाए।
याचिकाएं होशियारपुर के सेंट्रल वर्क्स डिवीजन के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर शिंगार चंद और एमएस ग्रेवाल ने दायर की थीं। दोनों अधिकारी ब्यास नदी पर उच्च स्तरीय पुल के एप्रोच रोड निर्माण कार्य की निगरानी कर रहे थे। छह रनिंग बिलों में लगभग 1.22 करोड़ रुपये के अधिक भुगतान का आरोप लगा जिसके आधार पर दिसंबर 1995 में उन्हें निलंबित किया गया और मई 1999 में बर्खास्त कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवा से हटाने का अधिकार प्रशासनिक होते हुए भी अर्ध-न्यायिक होता है। प्राधिकरण को आरोप, साक्ष्यों और आपत्तियों का सही विश्लेषण करना आवश्यक था, जो नहीं हुआ। हालांकि, अदालत ने कहा कि दोनों अधिकारी अब सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुके हैं, इसलिए उनकी बहाली का प्रश्न अप्रासंगिक हो गया है।