panchayat election : फंड अटका, चुनाव लटका; राजस्थान में पंचायत इलेक्शन पर छिड़ा सियासी घमासान

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राजस्थान में पंचायत चुनाव, फंड और कर्ज को लेकर सियासत तेज है। टीकाराम जूली ने सरकार पर चुनाव टालने, 1900 करोड़ फंड संकट और बढ़ते कर्ज के आरोप लगाए, वहीं जनता गैस किल्लत और महंगाई से जूझ रही है।

“Delay Elections, Raise Debt?”: Opposition Slams Government Over Panchayat Polls, Funds and Financial Crisis

राजस्थान की सियासत में पंचायत चुनाव, फंड और वित्तीय हालात को लेकर नया सियासी घमासान शुरू हो चुका है। एक तरफ पंचायतों के चुनावों में हो रही देरी का मुद्दा है तो दूसरी तरफ इस देरी की वजह से केंद्र से पंचायतों को मिलने वाली 1900 करोड़ रुपए की ग्रांट अटकने का खतरा भी मंडराने लगा है। विपक्ष हमलावर है।

पंचायत चुनावों में देरी को लेकर राज्य निर्वाचन आयोग को याचिका कर्ता पूर्व विधायक संयम लोढा की तरफ से सुप्रीम कोर्ट कंटेंप्ट का नोटिस दिया गया है। आयोग ने इस नोटिस के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहरा दिया। वहीं सरकार की तरफ से इस मामले में आयोग की चिट्ठी का अब तक कोई जवाब नहीं दिया गया है। सिर्फ यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा का बयान है कि सरकार चुनावों के लिए तैयार है।

1900 करोड़ का फंड अटका, जेजेएम, मनरेगा जैसी योजनाओं पर आ सकता है असर 
इस बीच राजस्थान में अब इन मुद्दों को लेकर सियासी बयानबाजी भी तेज हो चुकी है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पंचायत चुनाव में देरी से प्रदेश के ग्रामीण विकास पर संकट मंडरा रहा है। उन्होंने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद चुनाव की तैयारी नहीं हो रही है, जिससे केंद्र से मिलने वाले करीब 1900 करोड़ रुपये के फंड पर खतरा है। उनके अनुसार इस फंड के अटकने से स्वच्छ भारत मिशन, जल जीवन मिशन और मनरेगा जैसी योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।

जूली ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार चुनाव से बचने के लिए ग्रामीण विकास को दांव पर लगा रही है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि केंद्र से फंड नहीं मिला तो राज्य इसकी भरपाई कैसे करेगा, जबकि प्रदेश पहले से कर्ज के बोझ तले दबा है।

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जूली ने कहा पहले ही केंद्र ने 8 हजार करोड़ की कटौती की
वित्तीय मुद्दों पर भी विपक्ष ने सरकार को घेरा। जूली के अनुसार केंद्र से मिलने वाली राशि में 8,000 करोड़ रुपये से अधिक की कटौती हुई है। विभिन्न मदों में अपेक्षा से कम फंड मिलने के कारण राज्य की आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार कम समय में ही रिकॉर्ड स्तर का कर्ज ले रही है, जिससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा है। इसके साथ ही उन्होंने आम जनता की समस्याओं का जिक्र करते हुए कहा कि प्रदेश में गैस की किल्लत और महंगाई से लोग परेशान हैं। कुल मिलाकर, पंचायत चुनाव, फंड संकट और बढ़ते कर्ज को लेकर राजस्थान की राजनीति में टकराव और तेज हो गया है।

‘तीन साल में ही सवाल दो लाख करोड़ का कर्ज लिया’
जूली ने सरकार के सुशासन के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि ‘2 साल बनाम 5 साल’ की तुलना करने वाली भाजपा सरकार खुद कर्ज के मामले में रिकॉर्ड तोड़ रही है। उन्होंने कहा कि जहां पिछली कांग्रेस सरकार ने पांच वर्षों में 2.26 लाख करोड़ रुपए का कर्ज लिया, वहीं मौजूदा सरकार महज तीन साल में ही 2.22 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने वाली है। जूली ने तंज कसते हुए पूछा कि जब 5 साल का कर्ज 3 साल में लिया जा रहा है, तो सरकार किस आधार पर बेहतर वित्तीय प्रबंधन का दावा कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य की अर्थव्यवस्था (GSDP) करीब 1.13 लाख करोड़ रुपए (लगभग 6%) तक सिकुड़ना गंभीर चिंता का विषय है।

 

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Author: Farheen

सबसे ज्यादा पड़ गई

हालांकि निजी अस्पतालों की बात करें तो वहां इलाज का औसत खर्च 42,359 रुपये है, जो देश के औसत 50,508 रुपये से कम है। इसके बावजूद यह खर्च आम परिवार के लिए भारी ही साबित होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि दवाइयों, जांचों और अन्य सहायक सेवाओं पर होने वाला अतिरिक्त खर्च मरीजों की जेब पर दबाव बढ़ा रहा है। सरकारी अस्पतालों में भी पूरी तरह मुफ्त या सस्ती सुविधाएं उपलब्ध न होने के कारण लोगों को बाहर से सेवाएं लेनी पड़ती हैं, जिससे कुल खर्च बढ़ जाता है। ये आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि हरियाणा में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को और किफायती बनाने की जरूरत है ताकि लोगों पर इलाज का आर्थिक बोझ कम हो सके। साथ ही, जेब से होने वाले खर्च (आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर) को घटाने के लिए प्रभावी नीतियों की भी आवश्यकता है। चेरिटेबल अस्पतालों की स्थिति बेहतर चेरिटेबल अस्पतालों में दूसरे राज्यों व राष्ट्रीय औसत के मुकाबले खर्च आधे से भी कम है। हरियाणा में प्रति इलाज चेरिटेबल अस्पताल में औसत मेडिकल खर्च 16945 रुपये है जबकि अखिल भारतीय औसत 39,530 रुपये है। एक बार भर्ती होने पर खर्च हो जाते हैं 33,713 रुपये शहरी व ग्रामीण के सरकारी व प्राइवेट अस्पताल में ओवरआल औसतन खर्च हरियाणा में सस्ता है। आंकड़ों से पता चला कि हरियाणा में अस्पताल में भर्ती होने के हर मामले पर औसत मेडिकल खर्च 33,713 आता है, जो भारतीय औसत 34,064 रुपये से थोड़ा कम है। पंजाब में औसतन खर्च 35,703 रुपये है। जिन बीमारियों में भर्ती की जरूरत नहीं होती, उसमें भी ज्यादा खर्च कुछ ऐसी बीमारियां होती हैं जिसमें भर्ती होने की जरूरत नहीं होती, उसमें भी हरियाणा में इलाज कराना काफी महंगा है। हरियाणा में प्रति इलाज गांव में औसतन 1361 रुपये और शहर में 1464 रुपये का खर्च आता है जबकि राष्ट्रीय औसत गांव में 847 रुपये है और शहर में 884 रुपये है। यानी हरियाणा में इलाज का औसत खर्च राष्ट्रीय औसत से करीब 547 रुपये (63%) अधिक है। पड़ोसी राज्य पंजाब के गांव में औसतन खर्च 1283 रुपये और शहर में 1158 रुपये है। खाने का खर्च जोड़ने से खर्चा और बढ़ता है इलाज का खर्च सिर्फ दवा और अस्पताल तक सीमित नहीं रहता बल्कि आने-जाने और खाने का खर्च जोड़ने पर यह और बढ़ जाता है। हरियाणा में एक बार इलाज पर औसतन करीब 45,183 रुपये खर्च आता है। पूरे देश में यही औसत 41,463 रुपये है। यानी हरियाणा में लोगों को राष्ट्रीय औसत के मुकाबले करीब 3,720 रुपये (9%) ज्यादा खर्च करने पड़ते हैं। दूसरी ओर, पंजाब में भी अस्पताल में भर्ती होने पर कुल औसत खर्च 42,319 रुपये है। कारण : दवाओं व सर्जिकल आइटम की कमी से बढ़ता है खर्च पीजीआई रोहतक के पूर्व सर्जन डा. रणबीर दहिया कहते हैं कि सरकारी अस्पतालों में दवाइयां कम मिलती है। डाक्टर की लिखी पांच में से सिर्फ एक या दो दवाइयां ही अस्पताल में मिलती है। बाकी दवाइयां मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ती हैं। इसी तरह से हड्डियों के ऑपरेशन में लगने वाले इंप्लांट सरकारी अस्पताल में नहीं मिलते हैं। मरीज जब बाहर से खरीदता है तो उसका खर्च तो बढ़ जाता है। कई बार अस्पतालों में इतनी भीड़ होती है या टेस्ट की वेटिंग इतनी लंबी हो जाती है कि मरीज को प्राइवेट में जांच कराना आसान लगता है। इस वजह से खर्च बढ़ता है। इलाज के लिए बार-बार अस्पताल में आने से भी खर्च बढ़ता है। वहीं, आईएमए के पूर्व प्रधान डाॅ. अजय महाजन कहते हैं कि सरकारी अस्पतालों में अक्सर देखा जाता है कि दवाइयां और सर्जिकल सामान बाहर से मंगवाया जाता है, जिसकी वजह से खर्च बढ़ जाता है। मरीज का सबसे ज्यादा खर्च दवाइयों में होता है। किस राज्य में सरकारी अस्पताल में प्रति इलाज कितना खर्च क्रमांक राज्य / केंद्र शासित प्रदेश प्रति इलाज खर्च (₹) 1 छत्तीसगढ़ 3,913 2 दिल्ली 6,394 3 मध्य प्रदेश 4,647 4 राजस्थान 4,177 5 पंजाब 12,200 6 चंडीगढ़ 24,013