उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वर्षों से मतदान कर रहे लोगों को अचानक नोटिस थमाए जा रहे हैं और उनसे पहचान व निवास के नए प्रमाण मांगे जा रहे हैं। कई मतदाताओं का नाम बिना किसी सूचना के सूची से गायब कर दिया गया, तो कहीं एक ही परिवार के कुछ सदस्यों का नाम है और कुछ का हटा दिया गया। इस अव्यवस्था के कारण तहसीलों और निर्वाचन कार्यालयों में रोजाना शिकायतों का ढेर लग रहा है, लेकिन समाधान की रफ्तार बेहद धीमी है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि बीएलओ द्वारा सही तरीके से सत्यापन नहीं किया गया। कई बुजुर्ग मतदाता, जो दशकों से एक ही पते पर रह रहे हैं, उन्हें भी “संदिग्ध” बताकर नोटिस दे दिए गए। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और खराब है, जहां तकनीकी जानकारी के अभाव में लोग अपनी आपत्ति दर्ज ही नहीं करा पा रहे। राजनीतिक दलों ने भी इसे बड़ा मुद्दा बनाते हुए कहा है कि इस गड़बड़ी से आगामी चुनावों की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
निर्वाचन विभाग का कहना है कि सूची को शुद्ध करने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है और शिकायतों का निस्तारण तय समय में किया जाएगा। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। मतदाताओं का सवाल साफ है—क्या वोटर लिस्ट लोकतंत्र का आधार है या आम जनता के लिए एक नई पहेली?