Khabaron Ke Khiladi: राजद में रार से कितना बदलेगा चुनाव, ओवैसी का असर बढ़ेगा या घटेगा? जानें विश्लेषकों की राय|

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बिहार में चुनाव तारीखों का एलान का इंतजार जारी है। चुनाव तारीखों के एलान से पहले बिहार में सियासी पारा चढ़ा हुआ है। इस हफ्ते भी कई सियासी उठापटक जारी रहे। लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने अपनी नई पार्टी का एलान कर दिया। वहीं, लालू परिवार में चल रही सियासी रार भी पूरे हफ्ते सुर्खियों में बनी रही। वहीं, सत्ता पक्ष की ओर से 75 लाख महिलाओं को रोजगार के लिए 10 हजार रुपये देना भी सुर्खियों में रहा। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, समीर चौगांवकर, अवधेश कुमार, विजय त्रिवेदी और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।

राम कृपाल सिंह: लालू के परिवार में जिस बेटे के सिर पर पिता का हाथ हो हमारे यहां जनता उसी को नेता मानती है। आज तेजस्वी हैं तो है। बिहार में इस समय की जो मैं अगर बहुत थोड़े में कहूं ऐसा है कि एक बगीचा है और उसके तीन माली हैं। इनमें एक माली ओवैसी हैं, एक राहुल गांधी हैं और तीसरे तेजस्वी यादव हैं। आज की तारीख में कांग्रेस सोच रही है कि यह तो हमारी तरफ लौट रहे हैं। हम कैसे जाने दें? सीमांचल की ज्यादा से ज्यादा सीटें हमको मिले। राजद में जो वोट पड़ेगा लालू के नाम पर पड़ेगा। तेजस्वी के साथ मां-बाप दोनों हैं तो तेजस्वी की ही चलेगी। थोड़ा बहुत डेंट भले हो जाए। तेज प्रताप या रोहिणी के नाराज होने से मुझे लगता है कि कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

समीर चौगांवकर: मुझे लगता है कि मुस्लिम वोटर मोटे तौर पर महागठबंधन के साथ रहेगा। ओवैसी कितना नुकसान पहुंचा पाते हैं ये देखना होगा। 2020 का चुनाव देखेंगे तो 15 सीटों पर राजद 5000 से कम वोटों से जीती थी। यानी जो सीटें बहुत क्लोज फाइट में होगी वहां तेज प्रताप डेंट डाल सकते हैं क्योंकि उन्होंने बहुत स्पष्ट कह दिया है कि जिनको राजद धुत्कारेगा उनको हम पुचकारेंगे। अगर वहां टिकट नहीं मिलता तो हमारे पास आके टिकट लो।

 विजय त्रिवेदी: मुझे लग रहा है कि दोनों ही गठबंधन में मोटे तौर पर सीटों को लेकर एक सहमति है। हमेशा ही 10 पांच सीटें ऐसी होती हैं जिन पर लास्ट मिनट तक चर्चा चलती रहती है कि क्या होगा क्या नहीं होगा तो दोनों गठबंधन इस समय मुझे बहुत स्थाई गठबंधन के तौर पर दिख रहे हैं। मुकाबला इन दोनों गठबंधन के बीच में होगा। ओवैसी का मुझे लगता है कि इस बार वह कुछ बड़ा नहीं कर पाएंगे क्योंकि माइनॉरिटी वोट इस बार उन्हें राजद और कांग्रेस के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है। इसलिए वह सोच रहे हैं यदि गठबंधन में आ जाएं तो कुछ बात बन जाएगी तो ठीक है। प्रशांत किशोर थोड़ा सा ताकतवर बने हैं। उन्होंने काफी काम किया है। अब चुनाव में वो कितना असर डालते हैं ये देखने वाली बात होगी।

अनुराग वर्मा: बिहार में जातीय समीकरण किसी भी चीज के ऊपर आता है। हालांकि प्रशांत किशोर का पिछले दिनों जो कैंपेन रहा है इसमें उन्होंने बहुत मेहनत की है। इस चुनाव में कहीं ना कहीं वो असर दिखेगा। लेकिन उसमें एक चीज और भी है कि जो वो वोट काट रहे हैं वो एनडीए का काट रहे हैं। अगर एनडीए इस चीज को लोगों को समझा नहीं पाया कि अगर अगड़ों का वोट कटा और प्रशांत किशोर के पास गया तो अगला मुख्यमंत्री तेजस्वी हो सकते हैं। अगर यह लोगों को समझ नहीं आया तो एनडीए के लिए मुश्किल होने वाली है।

अवधेश कुमार:  1990 के चुनाव के बाद बिहार में एक दौर शुरू हुआ था। 2005 में उस दौर का अंत हुआ। 2005 से एक दौर चला। 2013 में जब नीतीश कुमार भाजपा से अलग हो गए। फिर 2015 से एक ऐसा दौर रहा। जब बिहार में एकदम अनिश्चितता थी, कल क्या होगा, नीतीश किधर जाएंगे, बाएं रहेंगे, दाएं रहेंगे। लालू यादव की पार्टी को जिस बिहार के लोगों ने पूरे परिवार सहित पांच चुनाव हरा दिया था। 18% वोट और 22 सीटों तक सिमटा दिया था। वह पार्टी फिर से आ गई। इस बार का चुनाव गहराई से देखेंगे तो ये बिहार की राजनीतिक दिशा तय करने वाला चुनाव साबित होने वाला है।

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Author: ILMA NEWSINDIA

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